झरना
पर्वतों की गोद से निकल,
झरने का जल बह चला।
मिलन करूं मैं धरा से,
यह कह कर चला।
मिलन हुआ धरा से,
पर उस मिलन में,
घना ताप सहकर
जल बना वाष्प,बने मेघ
और बरखा बन बरस गया।
जल पहुंचाया वहां तक मेघों ने,
जहां जन जीवन जल को तरस गया।
सफ़ल हो गया जीवन झरने का,
झर-झर झरते कुछ कर गया।।
_____✍️गीता
बहुत सुन्दर रचना, लाजवाब अभिव्यक्ति
समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी
अतिसुंदर
सादर आभार भाई जी 🙏
पर्वतों की गोद से निकल,
झरने का जल बह चला।
कहीं किसी की प्यास बुझी,
कहीं किसी का पाप धुला।।
वाह 👌 बहुत सुंदर 🙏