बदनामी का भय, न मान-हानि का डर .
वहीं है जग में सबसे ज्यादा प्रसन्न ।।1।।
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मन-माया से उपर है ब्रह्म ।
नर ही नारायण है,
जब नर को ना हो मन-माया से डर ।।2।।
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जब मन माया से मात खाती है ,
तब इंसां का ब्रह्मचर्य व्रत टूटता है ।।3।।
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असंभव पथों पे चलके, जिसने मंजिल पायी है
सच में वहीं कर्मयोगी कहलाया है ।।4।।
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जिन्दगी में एक ऐसा मोड सबको आता है
जिस मोड़ पे चलके नर खूद को पाता है ।।5।।
श्री राम ।।
बदनामी का भय, न मान-हानि का डर .
Comments
4 responses to “बदनामी का भय, न मान-हानि का डर .”
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Bahut khoob
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वाह
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असंभव पथों पे चलके, जिसने मंजिल पायी है
सच में वहीं कर्मयोगी कहलाया है ।।4।।
________ जीवन के यथार्थ से अवगत कराते हुए कवि विकास जी ने एक कर्म योगी को परिभाषित किया है और मोह माया से मन को दूर रखने की अति सुंदर रचना रची है… बहुत उम्दा लेखन -
असंभव पथों पे चलके, जिसने मंजिल पायी है
सच में वहीं कर्मयोगी कहलाया है ।
—– बहुत सुन्दर रचना।
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