क्यूं ना थोड़ा सा अलग बनें

क्यूं ना थोड़ा सा,
अलग बनें।
खुश रहने की सलाह,
बहुत दी..
अब खुश रहने की वजह बनें।
मिटा कर किसी के,
ह्रदय का संताप
फिर अपने ह्रदय की खुशी को माप।
खिलाकर किसी गरीब को खाना,
कितना सुख मिलता है इससे,
यह तो खिला कर ही जाना।
पढ़ा कर किसी निर्धन बच्चे को,
जान जाओगे तुम, सुख सच्चे को।
ह्रदय में बहने लगेगी,
एक पवित्र सी गंगा
वस्त्र दान कर दो,
गर मिले कोई भूखा नंगा।
किसी गरीब बेरोजगार को,
देकर अपने घर-आंगन में थोड़ा सा काम
सुख भर दो उसके जीवन में,
महसूस करा दो उसको भी,
स्वावलंबन का सुकून-ओ-आराम
_______✍गीता

Comments

4 responses to “क्यूं ना थोड़ा सा अलग बनें”

  1. पढ़ा कर किसी निर्धन बच्चे को,
    जान जाओगे तुम, सुख सच्चे को।
    ह्रदय में बहने लगेगी,
    एक पवित्र सी गंगा।
    ——- वाह, अति उत्तम प्रस्तुति। भाव व शिल्प दोनों ही उच्चस्तरीय हैं।

    1. Geeta kumari

      प्रेरक और उत्कृष्ट समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी हार्दिक आभार सर

  2. अतिसुंदर भाव

    1. Geeta kumari

      बहुत-बहुत धन्यवाद भाई जी🙏

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