वे बेजुबान

नवजात बच्चे
दूध पी रहे थे,
भूख उसे भी लगी थी,
दूध पिलाने में
भूख भी बहुत लगती है
दूध पिलाने में।
उर जल रहा था
आमाशय के तेजाब से,
बच्चों को छोटी सी
झाड़ीनुमा गुफा में छिपाकर
चल पड़ी वह घास चरने,
पलकें झपका कर
मासूमों से कह गई
जल्द आऊँगी।
शिकारी को पता था,
कब जानवर चरने निकलते हैं,
ऐसा ही हुआ,
थोड़ी देर में लगा
शिकारी का निशाना,
गोली लगी, गिर पड़ी वह हिरणी।
दो बच्चे झाड़ियों में
उसका इंतजार करते रह गए
धीरे धीरे सूख गए।
जाते जाते
इंसानियत को वे बेजुबान
पता नहीं क्या कह गए।

Comments

4 responses to “वे बेजुबान”

  1. बहुत सुन्दर रचना

  2. बहुत मार्मिक रचना

  3. Geeta kumari

    दो बच्चे झाड़ियों में
    उसका इंतजार करते रह गए
    धीरे धीरे सूख गए।
    जाते जाते
    इंसानियत को वे बेजुबान
    पता नहीं क्या कह गए।
    ___________ इंसानियत को शर्मसार करती हुई बेहद मार्मिक घटना का चित्रण किया है सतीश जी ने अपनी इस कविता में, पढ़कर दिल दहल उठा……बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति

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