कभी जिन्दगी हर्षपूर्ण है

एक गुलाब
एक सी पत्ती, काँटे, डंठल एक समान
फिर कौन रंग भरता है इनमें,
कहाँ है रंगों की खान।
लाल-सफेद, पीले, गुलाबी
कितने सारे हैं गुलाब,
इतने सारे रंग व खुशबू
मन विस्मित सा है जनाब।
जीवन इस गुलाब जैसा है
तरह तरह के रंग
कभी जिन्दगी हर्षपूर्ण है
कभी खूब बेढंग।
कभी सद्कर्मों की खुशबू
कभी गलत कार्य के काँटे
ईश्वर ने मानव को फल सब
कर्मों के अनुसार ही बांटे।
जितना हो सके मुझे अपने
कदमों को सद पर रखना है
क्योंकि मुझे ही कर्मो का फल
अपनी रसना में चखना है।

Comments

5 responses to “कभी जिन्दगी हर्षपूर्ण है”

  1. बहुत सुन्दर रचना

  2. Geeta kumari

    कभी सद्कर्मों की खुशबू
    कभी गलत कार्य के काँटे
    ईश्वर ने मानव को फल सब
    कर्मों के अनुसार ही बांटे।
    ___________ संपूर्ण कविता बहुत सुंदर है और एक गहराई लिए हुए हैं जैसे संपूर्ण जगत का ज्ञान जैसे एक कविता में ही समा गया है। गागर में सागर है सतीश जी की यह रचना, बहुत सुंदर शिल्प और भाव सहित, बहुत सुंदर साहित्य , लाजवाब अभिव्यक्ति ..वाह

  3. Geeta kumari

    कभी सद्कर्मों की खुशबू
    कभी गलत कार्य के काँटे
    ईश्वर ने मानव को फल सब
    कर्मों के अनुसार ही बांटे।
    ___________ संपूर्ण कविता बहुत सुंदर है और एक गहराई लिए हुए है। संपूर्ण जगत का ज्ञान जैसे एक कविता में ही समा गया है। गागर में सागर है कवि सतीश जी की यह रचना, बहुत सुंदर शिल्प और भाव सहित, बहुत सुंदर साहित्य , लाजवाब अभिव्यक्ति ..वाह

  4. अतिसुंदर रचना

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