नया स्वर फूँकना है

रोशनी कर दो ना
जला दो बल्ब सारे,
देखने हैं मुझे
दिवस में चाँद तारे।
अंधेरे से बहुत
उकता गया हूँ,
मन भरी पीड़ को
लिखता गया हूँ।
अब मुझे जूझना है,
नया स्वर फूँकना है,
बुलंदी है जगानी
नहीं अब टूटना है।
दर्द से आज कह दो
जरा दूरी बना ले,
मुझे अब वेदना को
दूर ही फेंकना हैं।
ठंड में ताप बनकर
स्वयं को सेंकना है।
तप्त मौसम अगर हो
शीत मन सींचना है।
मेरा अरमान हो अब
बुलंदी ही बुलंदी,
और संवेदना को
पास ही पास रखना है।
जिन्दगी की कहानी
सदा चलती रही है,
छोड़ कड़वाहटें सब
मधुर रस स्वाद चखना है।

Comments

3 responses to “नया स्वर फूँकना है”

  1. Geeta kumari

    जिन्दगी की कहानी
    सदा चलती रही है,
    छोड़ कड़वाहटें सब
    मधुर रस स्वाद चखना है।
    _________ जीवन की कठिनाइयों में ,उत्साहवर्धन करती हुई कवि सतीश जी की बहुत सुंदर और प्रेरक रचना, शिल्प और भाव का अनुपम संगम, लाजवाब अभिव्यक्ति..अति उत्तम लेखन

  2. बहुत सुन्दर कविता लिखी है वाह

  3. Deepa Sharma

    बहुत सुंदर कविता है

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