तैर ले बाढ़ है दुखों की अगर

छोड़ दे छोड़ दे उदासी को
कोई फायदा नहीं है चिंता से
गम में मत रह बढ़ा न दर्द ए दिल
कोई फायदा नहीं है चिंता से।
दुःख तो होता है कुछ भी खोने से
न कोई लौटता है रोने से
कुछ नया सोच दूर पीड़ा कर
ख्वाब ला मन में तू सलोने से।
जो भी चाहेगा कर्म ही देगा
तुझे भी फल मिलेगा बोने से
जाग जा हर घड़ी सवेरा है
कोई फायदा नहीं है सोने से।
कैसे पायेगा लक्ष्य तू ही बता
ऐसे मायूस पथ में होने से,
तैर ले बाढ़ है दुःखों की अगर
अपनी किस्मत को यूँ डुबोने से।

Comments

2 responses to “तैर ले बाढ़ है दुखों की अगर”

  1. Geeta kumari

    कैसे पायेगा लक्ष्य तू ही बता
    ऐसे मायूस पथ में होने से,
    तैर ले बाढ़ है दुःखों की अगर
    अपनी किस्मत को यूँ डुबोने से।
    ____________ पाठक को प्रोत्साहित करती हुई कवि सतीश जी की बहुत ही श्रेष्ठ रचना, उच्च स्तरीय लेखन

  2. बहुत ही उत्तम रचना

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