बाँधे कमर नई आशा से
फिर दिल्ली पंहुचा था वो
रोजी रोटी खोज रहा था,
बच्चों को भी भेज रहा था।
कई दिनों के बाद जिन्दगी
ढर्रे में आने वाली थी,
मगर वही फिर कोविड़ कोविड़,
होने चारों तरफ लगी,
रोजगार के पट हो डाउन,
होने को फिर है लॉकडाउन।
सुबह कमाते शाम हैं खाते
कभी कभी भूखे सोते हैं,
सुनकर बन्द लॉकडाउन को
भीतर ही भीतर रोते हैं।
भूख अलग से रोग अलग से
घूम घूम मुश्किल आई है,
लौट किस तरह जाऊँ फिर अब
मन की आशा मुरझाई है।
मन की आशा मुरझाई है
Comments
3 responses to “मन की आशा मुरझाई है”
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भूख अलग से रोग अलग से
घूम घूम मुश्किल आई है,
लौट किस तरह जाऊँ फिर अब
मन की आशा मुरझाई है।
________________ कोरोना महामारी के चलते दोबारा लॉकडाउन जैसी स्थिति आ गई है। ऐसी स्थिति में कवि की दृष्टि श्रमिक वर्ग की ओर उठी, श्रमिकों की स्थिति का मार्मिक एवम् यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बेहद संजीदा रचना।अति उत्तम लेखन -

मजदूरों की परेशानी बताती सुंदर कविता
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बहुत सही लिखा सर
बहुत से अनछुए पहलू हैं जो
लोकडाउन के कारण
अंधेरों में तड़प रहे हैं
फ्री सहायता लेने
में भी संकोच करते हैं
बहुत विकट परिस्थिति है
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