पूरब हो या हो पश्चिम,
उत्तर हो या हो दक्षिण।
घर हमारा हमें देता हर्ष है,
घर के बाहर तो संघर्ष ही संघर्ष है।
हम जीवन के सुख-दुख,
घर में ही बाॅंटते हैं।
बाहर मिलते हैं विरोधी,
रास्ते भी काटते हैं।
चिलचिलाती धूप और तूफानों से,
बचाता है हमें हमारा घर।
ठॅंड के मौसम में,
गर्माहट दिलाता है घर।
अपनी मर्जी से जीना सिखाता है घर,
रात को चैन की नींद सुलाता है घर।
घर से अधिक समय के लिए,
चले जाते हैं अगर कहीं
दुनियाँ के किसी भी कोने में हों,
तब याद बहुत आता है घर॥
_____✍गीता
हमारा घर
Comments
10 responses to “हमारा घर”
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आज के परिप्रेक्ष्य में सटीक कविता
बहुत सुंदर गीता जी-
समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद राजीव जी🙏
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अति उत्तम रचना
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धन्यवाद वंशिका
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वाह !कमाल का लेखन, सच्ची प्रस्तुति
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बहुत-बहुत धन्यवाद ममता जी
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बहुत खूब
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आभार पीयूष जी
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हम जीवन के सुख-दुख,
घर में ही बाॅंटते हैं।
बाहर मिलते हैं विरोधी,
रास्ते भी काटते हैं।
—- सच्ची पंक्तियाँ, बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।-
सुन्दर समीक्षा हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी
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