समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_३))

घर की दहलीज जब लाघीं तो ऐसा मंजर देखा
कहीं हो रही पार्टियां, कहीं हो रही शादियां
कुछ लोग ठाठ से जीते ,कुछ बच्चे होते दिखे गाड़ियां
भूखे प्यासे बच्चों को रोटी के लिए तरसते देखा
यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा
जिस बेटे की खातिर मन्नत मांगी खुद को दर-दर भटकाया
बेटे के लिए ही सपने संजोए
खूब पढ़ा लिखा उसे अफसर बनाया
उस बेटे ने मां बाप की कदर करी नहीं
मां-बाप को वृद्धाश्रम भेजते देखा
यह आंखों देखी सच्चाई ,नहीं कोई रूपरेखा

Comments

3 responses to “समाज की वास्तविक रूप रेखा(भाग_३))”

  1. Geeta kumari

    समसामयिक यथार्थ चित्रण की प्रस्तुति

  2. समसामयिक यथार्थ चित्रण

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