मै इंसानियत को खोजने चला हूँ, हैवानों के बाजार में।
कहाँ छुपा है इंसानियत, जरा देखें तो उसे क्या हाल है।।
इंसान और हैवान
Comments
9 responses to “इंसान और हैवान”
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बहुत ही लाजवाब और यथार्थ परक रचना
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आपकी समीक्षा मेरी रचना हेतु सदा ही रहा है। बहुत बहुत धन्यवाद।
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वाह
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पंडित जी धन्यवाद।
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बहुत सुंदर
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शुक्रिया जी।
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बहुत खूब
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हौसला अफ़जाइ के लिए धन्यवाद।
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Great
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