क्यूं नहीं समझते

हम क्यूं नहीं समझ पाते हैं मजदूरों की लाचारी को,
उधारी का ठप्पा लगाकर
ना देते पैसे मजदूरों की दिहाड़ी को,
मजदूर दिवस मनाने को तो कर दी शुरुआत,
ना मजदूरों की मजबूरी को ना जानना चाहा,
ना करी कभी प्यार से बात,
बस सत्ता के मद में चूर हो लजाते इनकी मजबूरी को,
हम क्यूं नहीं समझ पाते मजदूरों की लाचारी को।
असीम मेहनत करते,खूब पसीना बहाते,
दिन भर की मेहनत करके, तीन सौ रूपये की पगार बस पाते,
घर में यदि कोई बीमार हुआ,
पगार तो सब खत्म हुई थोड़ा और उधार लिया,
ज्यादा से ज्यादा मेहनत कराते,
परेशान करते उसको,कहकर ली गई उधारी को,
हम क्यूं नहीं समझ पाते मजदूरों की लाचारी को,
आज आई जैसे 1 मई मनाने लगे सब मजदूर दिवस,
मजदूरों की मजबूरी का फायदा उठा,मत करो उन्हें अब और विवश,
मजदूरों की मेहनत को समझो,हथियार मत बनाओ उसकी कमजोरी को,
हम क्यूं नहीं समझ पाते मजदूरों की लाचारी को।।
—–✍️–एकता—

Comments

9 responses to “क्यूं नहीं समझते”

  1. बहुत सुंदर भाव हैं

  2. अतिसुंदर रचना

    1. धन्यवाद

    1. धन्यवाद

  3. Satish Pandey

    हम क्यूं नहीं समझ पाते हैं मजदूरों की लाचारी को,
    उधारी का ठप्पा लगाकर
    नहीं देते हैं पैसे मजदूरों की दिहाड़ी को,
    —— बहुत सुंदर पंक्तियाँ और उच्च स्तरीय रचना।

    1. आपका सादर अभिनन्दन

  4. Amita Gupta

    मजदूरों की मेहनत को समझो, हथियार मत बनाओ उसकी कमजोरी को।।
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति

  5. आप सभी का सादर धन्यवाद

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