छंद कुण्डली. मंहगाई

आय न सके बढ़ाय पर, मंहगाई की मार
जीवन जीना कठिन है सुन लीजै सरकार
सुन लीजै सरकार, कैसे परिवार चलाए
गर्दन कटे गरीब, नहीं तलवार चलाए
कह पाठक कविराय, बढ़ेगी यूँ महगाई
पिछड़ जाएंगे लोग, और होगी कठिनाई

Comments

3 responses to “छंद कुण्डली. मंहगाई”

  1. सराहनीय प्रयास

  2. Praduman Amit

    बात पते की कही है आपने।

  3. यथार्थ परक रचना

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