वाह भाई क्या बात है,
पर समझ ना पाया आदमी की क्या औकात है,
सुबह से मना रहे मातृ दिवस,स्टेटस पर स्टेटस लगा रहे,
व्हाट्सएप, इंस्टा, फेसबुक, शेयर चैट, कुछ भी बाकी नहीं
भेज दिया बूढ़े मां बाप को वृद्ध आश्रम,दिखावे में मातृ दिवस मना रहे,
मां-बाप को जलील करने में,कोई कसर छोड़ते नहीं,
बिल्कुल भी ना पछताते हैं,
वाह भाई क्या बात है,
खुद को मिटाया जिस मां ने बेटों के खातिर,
नई गृहस्थी बसाई मां ने अपने बेटों के खातिर,
पता नहीं था मां को बहुएं आ गई शातिर
एक दिन का मातृ दिवस
Comments
4 responses to “एक दिन का मातृ दिवस”
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बहुत सुंदर आलोचनात्मक अभिव्यक्ति
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बहुत ही सुंदर और यथार्थ वर्णन
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अतिसुंदर भाव
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आपके भाव बहुत सुंदर तथा आपकी कविता विचारणीय तत्वों से भरपूर है
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