आज की कविताएँ

ना रस है ना छंद है, अलंकार से हीन
देखो कविता हो गयी, अब की कितना दीन
2
पाठक श्रोता दूर हैं, कवियों की भरमार
हिंदी कविता दुर्दशा, जैसे हो बीमार
3
तुलसी सूर कबीर, के जैसे दिखे न भाव
हिंदी कविता आज की, डूब रही है नाव
4
कविता का स्तर गिरा, खूब किया खिलवाड़
पाठक श्रोता ने किया, अपने बंद किवाड़

Comments

2 responses to “आज की कविताएँ”

  1. Amita

    सत्य कहा आपने,
    आशा करती हूं हम सभी के द्वारा ऐसी रचनाओं का सृजन हो जिससे मन की संतुष्टि के साथ-साथ, समाज का कल्याण हो सके।

  2. जी बिल्कुल 

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