मुस्कान

उफ़ ये बेरूखी वो तो इक झलक के प्यासे हैं
किस्मत से कमज़ोर हैं मुस्कान भी न पा सके

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जो तुम चिर प्रतीक्षित  सहचर  मैं ये ज्ञात कराता हूँ, हर्ष  तुम्हे  होगा  निश्चय  ही प्रियकर  बात बताता हूँ। तुमसे  पहले तेरे शत्रु का शीश विच्छेदन कर धड़ से, कटे मुंड अर्पित करता…

Responses

  1. बहुत ही खूबसूरत पंक्तियां कम शब्दों में आपने सब कुछ कह दिया

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