संभलना होगा तुझे

जिन्दगी के बुरे दिन
भूलने होंगे पथिक,
भुला कर वे बुरे दिन
पग बढ़ाने होंगे पथिक।
अब नहीं होगा बुरा,
अब भला ही मिलेगा
सोच कर आज तूने
पग बढ़ाने होंगे पथिक।
हो गया हो गया जो,
अंधेरी रात थी वो,
जो न सोची कभी
दर्द की बात थी वो।
उजाला बुझ गया था,
निर्दयी थी हवा वह,
दर्द में दिल था डूबा
खो गई थी दवा तब।
अब संभलना होगा तुझे
उजाला है जगाना,
आज के बाद अपना
दिल कभी मत रुलाना।
पास है जो भी तेरे
पकड़ चलता ही रह तू
अब मुझे मत रुलाना
भाग्य से कहता चल तू।

Comments

2 responses to “संभलना होगा तुझे”

  1. आज के बाद अपना
    दिल कभी मत रुलाना।
    पास है जो भी तेरे
    पकड़ चलता ही रह तू
    अब मुझे मत रुलाना
    भाग्य से कहता चल तू।… जिन्दगी के बुरे दिन
    भूलने होंगे पथिक,
    भुला कर वे बुरे दिन
    पग बढ़ाने होंगे पथिक।
    ……….. सम्पूर्ण कविता बहुत ही प्रेरक है.. उदास मन को शांत करने वाली बहुत सुन्दर और उच्च स्तरीय रचना… लेखनी को अभिवादन 🙏

  2. Praduman Amit

    वाह ,लिखने की शैली बहुत ही भावुक है।

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