प्रेम का दूसरा नाम हो तुम

प्रेम का दूसरा नाम हो तुम
क्या कहें मीठा
रसीला आम हो तुम।
सुबह-सुबह की
मनोहर सी छठा हो कहूँ
या किसी कीर्तन की
शाम हो तुम।
बढ़ा रही हो
इस कदर अपनी,
मुहब्बत की कहानी जैसे,
बढ़ रहे तेल का दाम हो तुम।

Comments

4 responses to “प्रेम का दूसरा नाम हो तुम”

  1. Praduman Amit

    वाह क्या कहने।

  2. बहुत सुन्दर-सुन्दर उपमान दिए है ं कवि सतीश जी ने अपनी इस कविता में… बहुत ख़ूब,लाजवाब लेखन

    1. धन्यवाद गीता जी

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