आम-खास

खेल होता है
कौन नहीं समझता है,
आम को
पीठ पीछे धोखा मिलता है,
कौन नहीं समझता है।
खास को बिना मांगे
सब कुछ मिल जाता है,
कौन नहीं समझता है।
जिसकी बोलने की आदत हो
वह मौन नहीं समझता है।
आम की उपेक्षा
खास को सब कुछ,
यही है, यही है
सच्चाई का सच।
व्यय होता है आम के नाम पर
जमा होता है
खास के जेब पर,
वो शांत होकर मान लेता है
अपना भाग्य,
विधाता के लेख पर।

Comments

2 responses to “आम-खास”

  1. समसामयिक यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है आपने अपनीं इस कविता में, उम्दा लेखन

    1. बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी

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