विचारों की विचार गाथा
पर हम तो शंकित रह गए
पुष्प जो हर्षित खिले थे
औंधे मुंह मुरझा गए
थी प्रणय की आस किन्तु
आस मेरी मृत हुई
दूर बैठी अप्सरा यह देख कर हर्षित हुई,
क्या करूँ क्या ना करूं
यह मन मेरा विचलित हुआ
देख शब्दों की दुर्दशा
कलम को रोना पड़ा।।
कलम को रोना पड़ा (मानवीकरण अलंकार)
Comments
2 responses to “कलम को रोना पड़ा (मानवीकरण अलंकार)”
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बेहतरीन सृजन
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धन्यवाद
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