रंग बदलती दुनियाँ

गिरगिट रंग बदलता है,
यह बचपन से जाना।
साॅंप डॅंक मारता है ,
यह भी हमने माना।
शेर शिकार करके खाए,
हाथी नकली दाॅंत दिखाए ।
इनकी प्रकृति ऐसी ही है,
ये प्रकृति ने ऐसे ही बनाए ।
मगर इंसान कब रंग बदल जाए,
कब डॅंक मार कर चला जाए,
यह कोई ना जाने।
कब कर दे अपनों का ही शिकार,
नकली दाॅंत दिखा-दिखा कर,
कब चुभा दे सीने में कटार॥
_____✍गीता

Comments

6 responses to “रंग बदलती दुनियाँ”

  1. रोहित

    यथार्थ पर आधारित सुंदर रचना

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद रोहित जी

  2. Satish Chandra Pandey

    बहुत खूब,वास्तविक जीवन प आधारित बहुत सुंदर रचना।

    1. समीक्षा के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

  3. Amita

    बेहतरीन यथार्थ परक रचना दीदी जी

    1. धन्यवाद अमिता

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