सुन्दर हरीतिमा यह
फैली हुई धरा में,
देती सुकून मन को,
लगता है हूँ हरा में।
लहलाते पेड़ डाली
महकी हुई धरा में
देती सुकून मन को
लगता है हूँ हरा मैं।
अब फूल खिल सकेंगे
बस सब्र कर ले मन तू
पतझड़ मना किया है
आँसू जमा किया है।
गर कल बरस न पाए
बादल हो जब जरूरत,
तब काम आ सके कुछ
धरती में यह मुहब्बत।
झकझोरने लगा है
भंवरा मुझे वो नीला,
पिघला रहा बरफ है,
करता है भाव गीला।
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