ख़ामोशियाँ जब ज़ुबाँ बनने लगीं

ख़ामोशियाँ जब ज़ुबाँ बनने लगीं,
रफ्ता-रफ्ता दिलों की दूरियाँ घटने लगीं।
मोहब्बत में मीठे अहसास हुए इस कदर,
एक दूजे की कदर अब बढ़ने लगी।
बिन कुछ कहे वो हमें अब समझने लगे,
ख़ामोशियाँ भी बातें करने लगी॥
______✍गीता

Comments

3 responses to “ख़ामोशियाँ जब ज़ुबाँ बनने लगीं”

  1. बहुत खूब, बहुत सुंदर सृजन

    1. बहुत-बहुत धन्यवाद सतीश जी

  2. vikash kumar

    ख़ामोशियाँ जब ज़ुबाँ बनने लगीं,
    रफ्ता-रफ्ता दिलों की दूरियाँ घटने लगीं।

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