हार को भी स्वीकार करना सीखो
मुश्किलों में संकल्प लिए बढ़ना सीखो
ज़िंदगी है कई इम्तिहानों से भरी
इन इम्तिहानों को मुस्कुरा कर पार करना सीखो
रास्ते में भले ही सामना हो कांटों से
उन काटों को फूल समझकर लांघना सीखो
गलतियों से घबराकर मुंह मोड़ने के बजाय
उनसे सीख लेकर आगे की ओर चलना सीखो
उतार चढ़ाव हैं सिक्के के दो पहलू समान
विकट परिस्थितियों में तटस्थ रहना सीखो
व्यर्थ समय पर अफ़सोस न करके
मौजूदा समय का सदुपयोग करना सीखो
असफलता की अंधकार से डरने के बदले
बुलंद हौसले से उजाले का उत्पादन करना सीखो
आत्मविश्वास व भरोसे का गहना पहन
जीवन को सही ढंग से जीना सीखो
सफ़र:सीख से सफलता तक
Comments
One response to “सफ़र:सीख से सफलता तक”
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एक सुंदर एंड प्रेरणादायक कविता। इस कविता में कवि ने न सिर्फ शांत रस, अपितु वीर रस के प्रयोग से पाठक को कर्मठ तथा आत्मविश्वासी होने के लिए प्रेरित किया है। कविता की प्रारंभिक पंक्तियों द्वारा कवि मनुष्य को स्वयं की असफलताओं को स्वीकार कर सदा चलते रहने के लिए प्रेरित करते हैं। कविता में कवि जीवन में आने वाली विषमताओं की तुलना काटों से करते हैं और स्वयं को इतना दृढ़ कर लेने की बात करते हैं, की हमें कांटे भी पुष्प के समान प्रतीत हों। कविता में कवि ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु को छुआ है, जो की है मानव द्वारा अतीत को सोचकर खेद या दुःख प्रकट करना। कवि कहते हैं की हमें अतीत पर खेद प्रकट न करके स्वयं पर आत्मविश्वास रख कर जीवन को सही ढंग से जीने के लिए प्रेरित होना चाहिए।
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