मेरी नज़्म को

मेरी नज़्म को अपने ज़ेहन 1 में उतर जाने दे,
अहसासों को मेरे ज़रा सा असर कर जाने दे।

भटकता रहा हूँ ताउम्र अजनबी दुनिया में,
तेरी ज़िंदगी में अब मुझे घर कर जाने दे।

तलाश रहे हैं मेरे लफ़्ज़ एक हसीन आईना,
अपनी आँखों में इन्हें ज़रा सा संवर जाने दे।

सिमटे हुए रखे थे जो जज़्बात ज़ेहन में हमारे,
उनको दिल में अपने ज़रा सा बिखर जाने दे।

मक्र-ओ-फ़रेब2 की दुनिया में जी लिए बहुत,
अब तसल्ली से मोहब्बत में हमें मर जाने दे।

1. मन; 2. छल-कपट।

 

यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना

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