मु’अय्यन 1 मंज़िल न सही, कहीं तो पहुँच जाऊँ,
मुकम्मल2 नज़्म न सही, चंद लफ़्ज़ में ढल जाऊँ।
इक मुब्हम3 मुअम्मा4 सी हो गई है ज़िंदगी मेरी,
जितना सुलझाऊँ, उतना ही मैं उलझता जाऊँ।
मेरे तवज़्ज़ु’-ए-ज़मीर5 की थाह कैसे पाओगे,
जंग की तंग गलियों में तुम्हें मैं कैसे ले जाऊँ।
सुना है बहुत हमने, डूबते को सहारा तिनके का,
बीच मझधार में तिनका, अब मैं कहाँ से लाऊँ।
हर लम्हा बदलती रहती है रंगत दुनिया की,
मस्लहत6 है कि अब मैं फीका ही रह जाऊँ।
माटी और कुम्हार को जब देखा बारीकी से,
सोचा जैसे ढाले दुनिया, वैसे ही ढलता जाऊँ।
गोल रास्तों का है मेरी ज़िंदगी का तन्हा सफ़र,
जहाँ से करूँ शुरू, वहीं फिर से पहुँचता जाऊँ।
1. तय; 2. पूर्ण; 3. अस्पष्ट; 4. पहेली; 5. मन की चिंता; 6. समझदारी।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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