लिखा है बस वही, जो दिल पे गुज़री है,
कैसे कहें ये शब 1, कैसे अकेले गुज़री है।
ओढ़ कर आ गए वो आज मेरे हालातों को,
कैसे बताएंगे वो क्या शानों2 पे गुज़री है।
वो एक सवाल है, और मैं जवाब उसका,
ज़िन्दगी इन्हीं सिलसिलों को ले गुज़री है।
जर्रा-जर्रा3 ख़ामोश है आज उनके ख़ौफ़ से,
डरते-डरते अभी हवा बस यहीं से गुज़री है।
रह-ए-ग़ुर्बत4 में ये सबक हमको मिला,
तारीकी 5 की फ़ज़ा6 चिराग़ तले गुज़री है।
1. रात; 2. कंधों; 3. हर कण; 4. गरीबी में जीवन; 5. अंधेरा; 6. माहौल।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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