आई सावन की फुहार ,
छाई रूत में खुमार,
घटाएं छाई है घनघोर,
रह-रहकर दामिनी दमके,
हवाएं मचा रही शोर,
बारिश की लगी है झडी,
जैसे झरनों की हो फुलझड़ी,
भीगा भीगा सा ये रुत है ,
भीगा भीगा सा यह मन है,
भीगा भीगा सा यह तन है,
मयूरा नाच रहे छमाछम,
कोयल भी लगा रही है तान |
Ai savan ki fuhar
Comments
10 responses to “Ai savan ki fuhar”
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अतीसुनदर
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Thanks
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Bahut khub
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Thanks
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बहुत खूब
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Sukriya
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आपकी कविता किसी की तारीफ़ की मोहताज नहीं
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Thanks sis
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बेहतरीन
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Good
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