अँधेरी बस्ती में रोशनी राशन में बाँटी जाती है,
लोहे के हार पहनकर, ज़िंदगी काटी जाती है।
आजकल आफ़ताब1भी आता नहीं है नज़र,
हुकूमत चाँद-सितारों को भी खाती जाती है।
मुहताज है मुक़द्दर जिनका एक रोटी के लिए,
कई मर्तबा लाठी उनके पीठ पे मारी जाती है।
एक निवाला भी नहीं नसीब जिसे ज़माने से,
भूख को ही खुराक समझ वो खाती जाती है।
जीकर ज़ुल्मों में जो जिस्म-ओ-रूह ख़ाक हुए,
बेदर्द हवा उनको भी फ़ौरन उड़ाती जाती है।
कैसे बुझा पाओगे ऐ क़ादिर2तुम उस आग को,
जो अश्क-ए-रवाँ3 मज़लूम की लगाती जाती है।
कितने ही दर्द छुपे हैं शहर की तंग गलियों में,
हर गली इक कहानी चुपचाप सुनाती जाती है।
1. सूरज; 2. शक्तिशाली भगवान; 3. बहते आँसू।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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