कहते सर्दी में चाय की तलब बढ़ जाती है पर गर्मी में कौन सा कम हो जाती है।
कहते सर्दी में चाय की तलब बढ़ जाती है पर गर्मी में कौन सा कम हो जाती है।
रची जाती यहां, प्यारी-प्यारी रचनाऐं मन के भावों को दर्शाती सामाजिक मुद्दों पर जागरूक कराती संस्कृति का दर्शन करवाती मन को आनंदित कर जाती रचनाओं उपरांत, समीक्षा पढ़ने की बारी आती जिसमे समीक्षकों की भिन्न […]
पल पल सोचूं कहाँ से ढूँढूं खुशियों की चाबी वो बचपन वाली मिल जाए तो फिर से जी लूँ ।
यह माया नगरी बड़ा परदा लुभाती चकाचौंध रंगीली दुनिया ख्याली मंज़िल एक हादसा परत दर परत खुलते राज डरावने सच नकली चेहरे अंधी दौड़ सर्वोपरि माया धज्जियां उड़ाते रिश्ते बिछा माया जाल दिखा सपने देती […]
दिल भी मेरा, दिमाग भी मेरा आंसू भी मेरे, मुसकान भी मेरी बसेरा तेरा।
कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही नही लेती, आंख मेरी नम कर जाती रोटी से शुरू हुई पलायन तक गई पर मौत पर जा कर रुकी तुम्हारी उदर-ज्वाला संग जंग आंख […]
कभी कहते थे जरा धीरे चल कभी कहते थे जरा सम्भल कर चल जनाब अब मौका यह है कि सब कहते है जरा चल तो सही इतनी थमी भी तो ठीक नहीं थोड़ा संतुलन बना […]
जब मिली रोटी किसी ने नखरा दिखाया जब मिली रोटी किसी ने भूख को मिटाया यह कैसी माया है तेरी भगवान् जब मिली रोटी किसी को तु नज़र आया।
संग संग चलती है सच्चाई और तन्हाई बयां की सच्चाई संग आई तन्हाई।
क्या तुम कभी यह भूल पाओगे क्या फिर कभी वापस आ पाओगे शायद तुम्हे आना पड़े, मजबूरी में मजबूरी बहुत कुछ करवाती है यह ही इन्सान को भटकाती है कैसे भूलोगे तुम, इस मीलों के […]
तुम दीया मैं बाती ही सही मैं बाती बन जली तुम बाती बदलते रहे।
जिधर ले जा रही उधर जा रहे और चाहती क्या है तु जिदंगी।
महामारी का दौर यह कैसा आया , वक़्त ने सबको बेबस बनाया , कुदरत ने इस धरती को बहुत खूबसूरत बनाया , पर इन्सान इस नेमत को सम्भाल ना पाया , तो महामारी ने आकर […]
इम्तिहां की हद हो गई वक़्त भी बेवफ़ा बन आया जिनके दम पर चलते थे सबसे पहले उनसे विसराया खुद कहा `दूर रहो मुझसे ʼ प्रेम की भिन्न परिभाषा से परिचित करवाया यह कोरोना काल […]
पहले जब होती थी मुलाकात तो अधरों पर उभरी मुसकान देती थी दिखाई आज जब मास्क लगाऐ मिले तो वही खिलखिलाहट नज़रों ने सुनाई।
जल तु इतना कोमल फिर कठोर क्यों तुम जीवन-रक्षक फिर प्राण-हरता क्यों तुम बहते सरल फिर तीव्र रूप क्यों तुम मीठी-प्यास फिर नमकीन क्यों यह गुस्से में नीला आसमान क्यों जलमग्न धरती थर-थर कांपे क्यों […]
बांवरी हुईं जा रही, सुन मुरली की बतिया, सुनी होती तान तो , क्या हाल होता, रसिया।
यह इतना धैर्य तुम कहाँ से लाएं तभी तो तुम शहीद् कहलाए शस्त्र तुम्हारे हाथ में था देश के मान के लिए अडे रहे अपने बाहुबल से ही शत्रु मार गिराए तभी तो तुम शहीद् […]
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