Anu Singla's Posts

रिश्ते

नहीं होता हर किसी के बस में रिश्तों को ताउम्र सम्भालना पड़ता है खुद को दांव पर लगाना। »

मन मन्दिर

सुस्वागतम् मैय्या आन बसो मोरे मन मन्दिर धड़कन मानिंद। »

निर्भया

कभी दिशा, कभी निर्भया,कभी मनीषा ,नन्ही बच्ची कोई, बस नाम अलग-अलग,कहानी सबकी एक, हर घड़ी डर का साया, ना जाने मर्द तुझे किस बात का घमंड है छाया, अबला होने का हर रोज एहसास करवाते हो, मेरी जान की कीमत बस तुने इतनी-सी लगाई, तेरी आँखों के सुकून से आगे बढ़ ना पाई, मेरे शरीर को मांस के टुकड़े से अधिक ना समझा, मेरी रूह में उतर जाने की तुने औकात ही नहीं पाई, ना सीता, ना द्रौपदी चल उठ अब बन झांसी की रानी तु,... »

कवि

ओ कवि, जरा सम्भल कर लिखना यह कविता नही परछाई है तेरी आत्मा का प्रतिरूप यह तेरे अन्दर छिपी भावनाओं की प्रतीक है अच्छे या बुरे उजागर हो जाओगे फिर दुराव- छिपाव ना रख पाओगे एक खुली किताब कहलाओगे उजागर अपनी हर पीड़ा कर जाओगे कलम तुम्हारा दृषिटकोण समझा जाएगी तुम्हारा हर अनुभव जग-जाहिर कर जाएगी फिर रहोगे ना खुद के ,बेपरदा हो जाओगे दर्पण सा ही अनुभव कर पाओगे । »

दो पहलू

सिक्के के दो पहलू समालोचना और आलोचना मन-पल्लवित होता सुन समालोचना वही रचना में आता निखार सुन आलोचना स्वीकारो ह्रदय से दोनों को एक समान यही बने कवि की सही पहचान। »

इन्सान

इन्सान नहीं कुछ बोलता वक़्त हैं बोलता बंदा कुछ नही हालातों से घिरा हुआ यह दिल है कुछ भरा हुआ काफिला खट्टी-मीठी यादों का छलकता पैमाना खुशियों का दर्द भरे जज़्बातों का समेटे कुछ आम – कुछ खास एहसासों का पुलिंदा गलतियों का नए पुराने किसी साज सा उम्मीदों से बंधा हुआ खवाबों से सजा हुआ इन्सान बोले भी तो क्या बोले नाच रहा किस्मत के हाथों कठपुतली सा। »

चुनाव

अरे भाई,चुनाव का वक़्त आया है , क्या करना है? कुछ भी करो, धर्म-धर्म खेलो, जाति-जाति खेलो, औरत संग अनाचार करवा लो, हर दुखती रग पर नमक डालो, बस चुनाव नही हारना है। »

मायानगरी

हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती एक बार फिर साबित यह होता है मत भागो चमकती चीज़ों के पीछे यह सब एक छलावा हैं उस चमक के पीछे भाग कर हम सबने खुद को ही दांव पर लगाया है। »

निर्भया

रात भी खुद के तम से डरी होगी चाँद की चमक भी शर्मिंदा होगी तारों ने ना टूटने की कसम खाई होगी जब बेबसी में उस क्षण की साक्षी होगी। »

निर्भया

अब के बाद मां-बाप मां-बाप ना रहेंगे ना जिंदा ना मुर्दा रहेंगे तो बस सांस लेती काया। »

खुद की जंग

ना जाने कितनी निर्भया ना जाने, कैसी मर्दानगी बर्बरता की हदें लांघी जुबां तक काटी धरती भी नहीं कांपी कानून को कुछ ना समझे कौन इन्हे इन्सान कहे जानवर भी इनसे हारे भगवान् भी नहीं आए बस ,अब बहुत हुया नारी को ही जगना होगा सितम का सामना करना होगा जंग को खुद ही लड़ना होगा जंग को खुद ही लड़ना होगा। »

एक और निर्भया

बस कुछ दिन की बात है सब भूल जाएंगे काम – धन्धों में मशगूल हो जाएंगे नईं कहानी का शोर मचाएंगे फिर कोई और निर्भया होगी जीवन की जंग हार जाएगी कोई कुछ ना करेगा बस इक नाम और जुड़ेगा। »

आम का बाग़

भगवान् की कृपा से मैने आमों के पेड़ों से भरा इक घर पाया हरेक पेड़ ने अलग-अलग रंग रूप पाया सबका आकार अलग,महक अलग फ़िजा में अलग ही महक उठी जब पेड़ों पर बौर आया जब पेड़ों पर फल आया तो सब का मन ललचाया फिर सब आमों से स्वाद भी अलग-अलग आया फिर आमों ने मुझे भिन्न-भिन्न किरदारों से मिलवाया किसी ने मांगे आम खुद तो किसी के घर मैने भिजवाया बहुतों को स्वाद खूब भाया तो कुछेक के मन को छू नहीं पाया किसी ने भगवान ... »

नया समाज

चलो आज अपने घर को ऐसा घर बनाते हैं जिसमे बड़े पेड़ के नीचे , नए पौधों को पनपने का सुख दे, खुशी से जिंदगी बिताते हैं, चलो आज अपने घर को ऐसा घर बनाते हैं पुराने अनुभव, नई सोच को, एक दूसरे का पूरक बना, सबको आत्म सम्मान से जीना सिखाते हैं , अपने छोटे से प्रयास से नया समाज बनाते है चलो आज अपने घर को नया घर बनाते हैं। »

अन्न- दाता

आज हमारा जीवन रक्षक, अन्न- दाता कर्म भूमि छोड़ कर दर – बदर सड़कों पर, संघर्ष करता, गरीब हर साल और गरीब होता जाता, सदियों से हक के लिए लड़ता , हर बार ठगा जाता , आत्म हत्या का विकल्प चुनता, कितना बेबस,सुनता कौन, राजनीति की भेंट चढता आया, वोट बैंक दिग्भ्रमित करता , अब तो उम्मीद भी हारने लगा, भटके कभी इस छोर कभी उस छोर कोई रखता नही याद इसका बलिदान दुआ करो, कही इसकी नई पीढ़ी भूल ना जाए खेत खलिहान... »

मासूम बचपन

मासूम बचपन कुचला जा रहा भीतर से सहमा, बाहर से उददंड हुया बिखरता हुया , गैज़ेटस के तले , अपनों के स्नेह-सानिध्य से वंचित सहमा हुया, आयायों के तले , सर्वगुण- संपन्न बनाने की होड़ में भागता हुआ, मृग मरीचिका के तले , सम्भाल लो,बचपन के खजाने को, मासूम बचपन कुचला जा रहा। »

साँवरे

साँवरे, इसमें हमारा नही कोई दोष तुम्हारा ख्याल आते नही रहता होश हमारी तो क्या बिसात जब खयाल तेरा राधे को करता मदहोश। »

हिन्दी -भाषा

सीमित अक्षर, सीमित मात्राऐं रचा शब्दों का असीमित भण्डार बना विशाल वृन्द भरे शब्दकोश बेशुमार कैसा खेल रचाया है इन शब्दों ने महकाया काव्य दरबार वही शब्द संभावनाएं अपार क्षमता भरपूर भिन्न भाव अमिल सोच तीव्र जज़्बात विपरीत परिस्थितियां तीक्ष्ण नज़र अदृश्य विचार स्पष्ट दृष्टिकोण नित उदित नवीन रचनाएँ खिला कवि परिवार सजा साहित्य संसार बढ़ाया सम्मान हिंदी ने हिंद का बीच विश्व विशाल। सन्देश हर हिन्द वासी क... »

मानव तन

कुकडू -कडू कुकडू -कडू करता रहूँ , करता रहूँ मन में सोच रहा, मैं भी तो एक जीव हूँ, बांग से जगाता हूँ, महफ़िलों की शान हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, जल की मैं रानी हूँ, भून दी जाती हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, मैं-मैं करती हूँ, मन की भोली-भाली हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, मन में सोचूं कभी मानव तन पाऊँ जब तेरे गर्भवती विनायकी के छल को देखूं ऐसा ही कर्म करूँ तो कभी ना मानव तन पाऊँ कुकडू -कडू कुकडू -कडू करता ... »

ख़तावार

जब सब के भीतर तु है समाया तब भी मुझे कैसे तु नजर ना आया ख़तावार हूँ मैं खुद को ना इसका पात्र बना पाया। »

लाॅकडाउन समय

लगता था जिंदगी बहुत बेमानी हो गई पहले-पहल ऐसे लगा कुछ छूट रहा यह जग सारा टूट रहा फिर कुछ दिन बीते मन शांत होने लगा छूटने का गम नहीं कुछ पाने की चाह हुई यह कुछ पाना कुछ और ना था खुद को ही जानने की चाह थी खुद में ही खोने की राह थी पहचाना स्वयं को,अब और क्या है बाकी जिंदगी अब बेमानी नही शान्त सी लगने लगी अब भीतर-बाहर कोई शोर नहीं मौन नदिया सी बहने लगी। »

चाय

कहते सर्दी में चाय की तलब बढ़ जाती है पर गर्मी में कौन सा कम हो जाती है। »

रचना की समीक्षा

रची जाती यहां, प्यारी-प्यारी रचनाऐं मन के भावों को दर्शाती सामाजिक मुद्दों पर जागरूक कराती संस्कृति का दर्शन करवाती मन को आनंदित कर जाती रचनाओं उपरांत, समीक्षा पढ़ने की बारी आती जिसमे समीक्षकों की भिन्न सोच दिखाई देती तो रचनाओं की गहराई जान पाती जो आनंद को दोगुना कर देती मैं भाव-विभोर हो जाती। »

बचपन

पल पल सोचूं कहाँ से ढूँढूं खुशियों की चाबी वो बचपन वाली मिल जाए तो फिर से जी लूँ । »

माया नगरी

यह माया नगरी बड़ा परदा लुभाती चकाचौंध रंगीली दुनिया ख्याली मंज़िल एक हादसा परत दर परत खुलते राज डरावने सच नकली चेहरे अंधी दौड़ सर्वोपरि माया धज्जियां उड़ाते रिश्ते बिछा माया जाल दिखा सपने देती चंद सितारे लील लेती आंखों के तारे। »

दिल-दिमाग

दिल भी मेरा, दिमाग भी मेरा आंसू भी मेरे, मुसकान भी मेरी बसेरा तेरा। »

तुम्हारी व्यथा

कितनी व्यथा है तुम्हारी जो कम होने का नाम ही नही लेती, आंख मेरी नम कर जाती रोटी से शुरू हुई पलायन तक गई पर मौत पर जा कर रुकी तुम्हारी उदर-ज्वाला संग जंग आंख मेरी नम कर जाती हजारों मील पैदल चले,पांव मे छाले पड़े पर गांव तक पहुँच ना पाऐ तुम्हारी जड़ो को छूने की कसक आंख मेरी नम कर जाती हाथगाड़ी से गृहस्थी को ढ़ोते देखा बैल की जगह जुटते देखा रेल की पटरी पर मरते देखा तुम्हारी मिट्टी में मिलने की कहानी ... »

कोरोना काल

कभी कहते थे जरा धीरे चल कभी कहते थे जरा सम्भल कर चल जनाब अब मौका यह है कि सब कहते है जरा चल तो सही इतनी थमी भी तो ठीक नहीं थोड़ा संतुलन बना कर चल यह प्रकृति हमें सिखा रही जिंदगी में समता का पाठ पढ़ा रही। »

रोटी

जब मिली रोटी किसी ने नखरा दिखाया जब मिली रोटी किसी ने भूख को मिटाया यह कैसी माया है तेरी भगवान् जब मिली रोटी किसी को तु नज़र आया। »

सच्ची बात

संग संग चलती है सच्चाई और तन्हाई बयां की सच्चाई संग आई तन्हाई। »

प्रवासी मजदूर

क्या तुम कभी यह भूल पाओगे क्या फिर कभी वापस आ पाओगे शायद तुम्हे आना पड़े, मजबूरी में मजबूरी बहुत कुछ करवाती है यह ही इन्सान को भटकाती है कैसे भूलोगे तुम, इस मीलों के सफर को जब तुम आए पहली बार, मन में लिए तरंगें हजार जीवन में कुछ पाने की चाह लिए छोड़ा परिवार अब, फिर वक़्त ने ठोकर मारी फिर छोड़ना पड़ा बसा बसाया घर बार हर बार क्या यूँ ही उजड़ते रहोगे तुम अपने किसके कहलाओगे तुम्हे वापस ना आना पड़े इस ... »

दीया बाती

तुम दीया मैं बाती ही सही मैं बाती बन जली तुम बाती बदलते रहे। »

जिदंगी

जिधर ले जा रही उधर जा रहे और चाहती क्या है तु जिदंगी। »

कोरोना

महामारी का दौर यह कैसा आया , वक़्त ने सबको बेबस बनाया , कुदरत ने इस धरती को बहुत खूबसूरत बनाया , पर इन्सान इस नेमत को सम्भाल ना पाया , तो महामारी ने आकर इसका मोल बताया , कुदरत ने हर साधन अपार मात्रा मे बनाया , पर इन्सान के लालच का अंत ना हो पाया , तो बीमारियों की आड़ में सबको फंसाया , कुदरत बार-बार करती है इशारा , पर इन्सान अपनी ही धुन में चलता आया , तो आपदाओं के रूप में आकर समझाया , महामारी का दौ... »

कोरोना

इम्तिहां की हद हो गई वक़्त भी बेवफ़ा बन आया जिनके दम पर चलते थे सबसे पहले उनसे विसराया खुद कहा `दूर रहो मुझसे ʼ प्रेम की भिन्न परिभाषा से परिचित करवाया यह कोरोना काल कहलाया यह कोरोना काल कहलाया। »

Mask

पहले जब होती थी मुलाकात तो अधरों पर उभरी मुसकान देती थी दिखाई आज जब मास्क लगाऐ मिले तो वही खिलखिलाहट नज़रों ने सुनाई। »

जल

जल तु इतना कोमल फिर कठोर क्यों तुम जीवन-रक्षक फिर प्राण-हरता क्यों तुम बहते सरल फिर तीव्र रूप क्यों तुम मीठी-प्यास फिर नमकीन क्यों यह गुस्से में नीला आसमान क्यों जलमग्न धरती थर-थर कांपे क्यों इन्सान खुद ही प्रकृति का विनाश कर पूछें क्यों खुदगर्ज इन्सान अपने बिछाऐ जाल फंस अब रोए क्यों प्रकृति को प्यार कर, सहेज ले, यह और नहीं कुछ चाहती अवसर अभी बाकी है तपता सूरज, चाँदनी रातें, महकती हवाएँ, अभी गंगा ... »

कान्हा

बांवरी हुईं जा रही, सुन मुरली की बतिया, सुनी होती तान तो , क्या हाल होता, रसिया। »

शहीदों के नाम

यह इतना धैर्य तुम कहाँ से लाएं तभी तो तुम शहीद् कहलाए शस्त्र तुम्हारे हाथ में था देश के मान के लिए अडे रहे अपने बाहुबल से ही शत्रु मार गिराए तभी तो तुम शहीद् कहलाए घर तुम्हारा भी था परिवार बैठा था आँखे बिछाऐ तुमने देश वासी हीं रिश्तेदार बनाऐ तभी तो तुम शहीद् कहलाए सपने तुम्हारे भी थे पूरा करने का इंतजार लिए देश के लिए बलिवेदी पर चढाऐ तभी तो तुम शहीद् कहलाए यह इतना धैर्य तुम कहाँ से लाएं तभी तो तुम... »