Anu Singla's Posts

भोर

भोर होती है हर रोज बहुल के लिए आशा की एक किरण लेकर नऐ विचार नई ख्वाहिशें नई चाह नई भूख जो होती है पद-प्रतिष्ठा धन- दौलत वस्तुओं संबंधों को समेटने की… बहुल के होती है भोर बस वही प्राचीन एक चिर-परिचित भूख लिए रोटी की….. »

रंग

हे रंगरेज़ बावरी मत समझ लेना बात बार-बार दोहरांयू तो यह अदा है इज़हार की मुकम्मल नही हूँ, हूँ कुछ अधूरी सी रंग दोगे जो अपने रंग में इबादत पूर्ण हो जाएगी।। »

पतझर

आंखे तेरी सब कह देती है हाले दिल बयां कर जाती है जो कह नही पाते हो जुबान से वही दर्द वो चुपके से बता जाती है संगी बिन जीना कितना मुश्किल दिल का आर्तनाद सुना जाती है जो प्यार तुम जीवन भर बता ना सके उसी प्रीत की चुगली कर जाती है… उसने जताया पल-पल प्रेम, मांग दुआ, व्रत-उपवास रख वो भी जुबान से कुछ ना कहती थी…. वो जीवित है भीतर तेरे, चलती है श्र्वासो की तरह, यह तेरे अश्रुरहित भीगे नयन, गूंज... »

चला चली का मेला

आखिर इक दिन सबको जाना है यह जग चला चली का मेला है यहाँ किसी का नही ठिकाना है फिर किस बात का घबराना है बस इतना सा हमारा अफ़साना है आख़िर इक दिन सबको जाना है ना कुछ संग आया था,ना जाना है कर्मो ने ही अपना फर्ज निभाना है पाप पुण्य की गठरी बांध उड़ जाना है पांच तत्व की काया को मिट्टी हो जाना है आखिर इक दिन सबको जाना है आत्मा को आवागमन से मुक्त कर क्षितिज पार जाना है कुछ प्रतीक्षारत तारों को एक बार गले ... »

मै हूँ ना

आज valentine’s day है मौसम मनचला सा हो रहा है हर और इश्क खिल उठा है याद कर रही हूँ खूबसूरत लम्हों को, नही, मुझे नही याद आ रही वो कपड़े, गहने, फूलों की लम्बी फेहरिस्त…. झंकृत कर रहे है मुझे वो बेशकीमती पल जब-जब रूह से रूह का एकाकार हुआ, भीड़ में तुम्हारा धीरे से मेरा हाथ थाम लेना, घबरा जाना मेरे बीमार होने पर, समझ जाना अनकही मेरे मन की बात को, और मौन नज़रों से तुम्हारा यह कहना “मै... »

रसोई घर में खलबली

आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है चाय और काफ़ी रहती थी सगी बहनों सी ग्रीन टी आकर सौतन सी अकड़ रही है आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है दूध,दही,छाछ की बहा करती थी नदियां स्मूदी,माॅकटेल रंगीन बोतलों में बंद रंग जमा रही है आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है मक्खन और घी से महकता था आंगन चीज़ और म्योनीज चिकनी चुपड़ी बातें कर भरमा रही है आज कल रसोई घर में खलबली सी मच रही है दाल,रोटी सब्जी,चावल,प... »

नज़र

मत देख अपनी नज़र से हर बार कभी तो ले तु मेरी नज़र उधार । »

सोच समझ के बोल

सोच समझ के बोल रे बंदिया सोच समझ के बोल जो तु बोले, तेरा पीछा ना छोड़े मांगे हर अल्फाज़ अपना हिसाब मान-अपमान दिलवाते, दिखलाये संस्कार यही बनाए तेरे वैरी यही बनाए यार सोच समझ के बोल रे बंदिया सोच समझ के बोल छलकेगा प्यार तेरा जिन अल्फाज़ों से वो तेरा दामन खुशियों से भर देंगे करेगा क्रोध जब तु इन्ही अल्फाज़ों से फिर पीछा ना छूटे दर्द भरी तनहाईयों से सब सच है कहते सोच समझ के बोल रे बंदिया सोच समझ के ब... »

जिंदगी

यह जो जिंदगी इतना सबक सिखाऐ जा रही हो मुझे अनुभवों का पुलिंदा बनाऐ जा रही हो जिंदगी है चार दिन की क्यों इतनी मगजमारी किऐ जा रही हो । »

लोहड़ी का त्यौहार

आजो सारे, आजो सारे ,रल मिल लोहड़ी पाइऐ, दुल्ला भट्टी दा गीत गा,विहड़े विच अलाव जलाइऐ, मूँगफली,गच्चक,रेवड़ी खाइऐ ते सबनू खवाइऐ, मक्की दी रोटी, सरसों दा साग,खीर बनाइऐ, पतंग उड़ाइऐ,नवी फसल दी खुशी मनाइऐ, शगुनां वाला त्यौहार है आया,नच टप धूमां पाइऐ। »

जिंदगी इक तमाशा

जिंदगी इक तमाशा है तमाशा वेखण आया ऐ बंदिया तु वेख जी भरके ज़माने दे रंगां नु पर किसे दा तमाशा बनावी ना ते आपनां भी विखावी ना। »

मृग मरीचिका

वो छत क्या अचानक गिर गई गिरी नही ऐसा कहो गिराई गई नींव संवेदनहीनता की रेत लालच की ईंट भ्रष्टाचार की सीमेंट बेईमानी का माया का जाल बिछा मूल्यों को तिजोरी में बंद इंसानियत को दफना निर्माण …….. नहीं बस ढांचा खड़ा किया जनता है तो मोल चुकता करने को जो चुकाती हैं कीमत इन्सान होने की एक सांस अधिक ना ले पाओगे फिर किस मृगमरीचिका में गठरी बांध रहे हो इस हादसे के बोझ के गट्ठर को छोड़ ना पाओगे । »

2021

उठती रहेगी इक लहर सागर से निरंतर जो समाहित कर लेगी हर पीड़ा जो दी बीते वर्ष ने हर बार होगी इक नईं हिलोर जो देगी हौंसला सतत् नवीन जीवन जीने की नववर्ष में। »

2021 शुभ शगुन

आ रहा है दौ हजार इक्कीस का नव वर्ष करते हैं हम दिल से अभिनंदन बार-बार इक्कीस अंक होता है प्यारा सा शगुन आना तुम हर जीवन में शुभ शगुन रूप धार पग पैंजनीया बांध आना हर जीवन में रूप नव्य धार उमंग,उल्लास,उम्मीद लाना जैसे नव शिशु मारे किलकार वसुधा पर फैले हर और ऐश्वर्य अपार मेहनत,हिम्मत,जुनून बन छाना जैसे तरुणाई मारे ललकार हर परिवार में आना बन तीज-त्यौहार सफलता, स्नेह, सम्मान सर्व को जैसे गुरु पाऐ सत्का... »

वक़्त की ताकत

बीत जाएगा यह वक़्त भी वक़्त कभी थमता नही अगर थमता तो वक़्त कहलाता नही एक दिन यह वक़्त इतिहास बन जाएगा इतिहास दोहराया जाता है इतिहास दोहराया जाएगा वक़्त कभी थमता नही यह वक़्त भी बीत ही जाएगा यह इतिहास सदियों की विरासत कहलाएगा। »

कृष्णा भजन

कृष्णा जी की प्यारी ,राधा न्यारी बसो मोरे मन मन्दिर बिहारी,संग वृषभानु दुलारी तुम बिन कोई ना ठौर हमारी, जाऊँ बलिहारी पल पल याद करूँ त्रिपुरारी, आऐ शरण तिहारी कृष्णा जी की प्यारी, राधा न्यारी बसो मोरे मन मन्दिर बिहारी, संग वृषभानु दुलारी मुखड़ा तेरा नूरानी, तेरा मेरा रिश्ता तो रूहानी दाता अपनी है यारी पुरानी, हमको चरणन से ना बिसारी कृष्णा जी की प्यारी, राधा न्यारी बसो मोरे मन मन्दिर बिहारी, संग वृष... »

उफ्फ़

उफ्फ़ ,यह सर्द हवाऐं मद्धम सा सूरज ना बाहर बैठा जाए ना भीतर चैन आए। »

राधा-श्याम

प्रिये, यह आज तुमने कैसी चाय है बनाई कौन सी लजीज़ वस्तु है मिलाई घूंट-घूंट पीते अजब रूहानी मस्ती है छाई इससे पहले तो कभी ऐसी चाय ना पिलाई। नही जानाँ, आज बस चाय बनाते राधा-श्याम धुन थी लगाई। »

दोधारी तलवार

क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग… क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पाते हम लोग…. जानते हैं कुछ साथ नहीं कुछ जाना फिर भी क्यों जोडने की होड़ में लगे हैं लोग… सब कहते है भगवान एक है फिर क्यों अनेक रूप साबित करने में लगे हैं लोग… कहते हो अपने तो अपने होते हैं फिर क्यों अपनों को बेगाना बनाने में लगे रहते हैं लोग… क्यों दोधारी तलवार से हैं लोग… क्यों सच को स्वीकार नहीं कर पा... »

अपना हक

क्यों दिल्ली आज हिल रही क्यों इतना डर रही वो ह़क लेने आ रहे जान की बाजी लगा रहे राह में कितने रोड़े अटकाओगे अब रोक नहीं पाओगे जितनी बंदिशे लगाओगे संघर्ष का उग्र रूप पाओगे क्या सुलगता रक्त देखा कभी क्या उलझता युद्ध देखा कभी यही तो दिल्ली को हिला रहा नही, वो डराने नहीं आ रहा आ बैठ,सुन उसकी बात बस वो अपना हक़ लेने आ रहा । »

माटी के दीपक

मै नन्हा सा दीपक माटी का घी संग बाती जब दहकूं खिलखिला कर हसूं चांद के जैसे इतराऊं तम को गटागट पी जाऊँ शांत नदिया सा जगमगाऊं आखिरी सांस तक सपने सींचू…… तु भी तो पुतला माटी का तु मन में आशा का दीप जला प्रेम का घी, सदकर्मो की बाती दहका भीतर के तम से लड़ जा खुशियाँ जी भर के बिखरा किसी के गमों मे शरीक हो जा बैर-भाव मिटा तु भी मुझ-सा कर्म कमा दीपावली का सच्चा अर्थ समझा । »

किन्नर

प्यार दूर की बात सम्मान कभी सपने में भी ना सोचूं तुम तो देखने से भी कतराए देख कर नज़र फेर ली फिर कहते हो मेरी दुआओं मे बड़ी ताकत हैं जल्दी कबूल हो जाती है अगर तुम कहो दुआओं के मैं बादल बरसा दूं बस एक बार जो जन्म से मिला अधूरापन तुम उसे भुला इन्सान समझ लेना कभी बदन से नजरें उठा तानों से छलनी रूह को निहारना कभी सम्मान की नजरों से देख पड़ना हमारी नज़रों की बेबसी किन्नर नही हमें हमारे नाम से पुकारना भ... »

अश्क मेरे

अश्क जो बहे नयनों से लुढ़के गालों पे मेरे किसी ने ही देखे अनदेखे ही हुऐ अश्क जो अटके गले में गटके हर सांस में ना देखे किसी ने अनदेखे ही रहे तोड़े मुझे हर बार भीतर से च़टके कुछ ज़ोर से बिन किसी शौर के। सुधार के लिए सुझाव का स्वागत है। »

श्री राम जी के नाम एक पाती

विजयादशमी का यह पावन पर्व वर्षों से समाज को सच्चाई का सबक सिखाऐ पर आज यह एक प्रश्न उठाये आज प्रतयंजा कौन चढ़ाऐ कौन बाण आज छुड़ाए इस युग में कोई काबिल नहीं जो रावण का संहार करे आज कोई राम नहीं हर और रावण ही रावण छाऐ दशानन कहलाता ज्ञानी अभिमानी डंके की चोट पर युद्ध को ललकारे आज मानव छद्म वेश धार अपनों के पीठ पीछे वार करे आज मंथरा घर-घर छाई है विभीषण ने ही दुनिया में धूम मचाई है अब राम कैसे आए कोई शब... »

हर शाम

हर पल लगता बहुत सीख लिया अब जीवन में भ्रम तोड़ जाती हर शाम इक नईं शिक्षा दे »

रिश्ते

नहीं होता हर किसी के बस में रिश्तों को ताउम्र सम्भालना पड़ता है खुद को दांव पर लगाना। »

मन मन्दिर

सुस्वागतम् मैय्या आन बसो मोरे मन मन्दिर धड़कन मानिंद। »

निर्भया

कभी दिशा, कभी निर्भया,कभी मनीषा ,नन्ही बच्ची कोई, बस नाम अलग-अलग,कहानी सबकी एक, हर घड़ी डर का साया, ना जाने मर्द तुझे किस बात का घमंड है छाया, अबला होने का हर रोज एहसास करवाते हो, मेरी जान की कीमत बस तुने इतनी-सी लगाई, तेरी आँखों के सुकून से आगे बढ़ ना पाई, मेरे शरीर को मांस के टुकड़े से अधिक ना समझा, मेरी रूह में उतर जाने की तुने औकात ही नहीं पाई, ना सीता, ना द्रौपदी चल उठ अब बन झांसी की रानी तु,... »

कवि

ओ कवि, जरा सम्भल कर लिखना यह कविता नही परछाई है तेरी आत्मा का प्रतिरूप यह तेरे अन्दर छिपी भावनाओं की प्रतीक है अच्छे या बुरे उजागर हो जाओगे फिर दुराव- छिपाव ना रख पाओगे एक खुली किताब कहलाओगे उजागर अपनी हर पीड़ा कर जाओगे कलम तुम्हारा दृषिटकोण समझा जाएगी तुम्हारा हर अनुभव जग-जाहिर कर जाएगी फिर रहोगे ना खुद के ,बेपरदा हो जाओगे दर्पण सा ही अनुभव कर पाओगे । »

दो पहलू

सिक्के के दो पहलू समालोचना और आलोचना मन-पल्लवित होता सुन समालोचना वही रचना में आता निखार सुन आलोचना स्वीकारो ह्रदय से दोनों को एक समान यही बने कवि की सही पहचान। »

इन्सान

इन्सान नहीं कुछ बोलता वक़्त हैं बोलता बंदा कुछ नही हालातों से घिरा हुआ यह दिल है कुछ भरा हुआ काफिला खट्टी-मीठी यादों का छलकता पैमाना खुशियों का दर्द भरे जज़्बातों का समेटे कुछ आम – कुछ खास एहसासों का पुलिंदा गलतियों का नए पुराने किसी साज सा उम्मीदों से बंधा हुआ खवाबों से सजा हुआ इन्सान बोले भी तो क्या बोले नाच रहा किस्मत के हाथों कठपुतली सा। »

चुनाव

अरे भाई,चुनाव का वक़्त आया है , क्या करना है? कुछ भी करो, धर्म-धर्म खेलो, जाति-जाति खेलो, औरत संग अनाचार करवा लो, हर दुखती रग पर नमक डालो, बस चुनाव नही हारना है। »

मायानगरी

हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती एक बार फिर साबित यह होता है मत भागो चमकती चीज़ों के पीछे यह सब एक छलावा हैं उस चमक के पीछे भाग कर हम सबने खुद को ही दांव पर लगाया है। »

निर्भया

रात भी खुद के तम से डरी होगी चाँद की चमक भी शर्मिंदा होगी तारों ने ना टूटने की कसम खाई होगी जब बेबसी में उस क्षण की साक्षी होगी। »

निर्भया

अब के बाद मां-बाप मां-बाप ना रहेंगे ना जिंदा ना मुर्दा रहेंगे तो बस सांस लेती काया। »

खुद की जंग

ना जाने कितनी निर्भया ना जाने, कैसी मर्दानगी बर्बरता की हदें लांघी जुबां तक काटी धरती भी नहीं कांपी कानून को कुछ ना समझे कौन इन्हे इन्सान कहे जानवर भी इनसे हारे भगवान् भी नहीं आए बस ,अब बहुत हुया नारी को ही जगना होगा सितम का सामना करना होगा जंग को खुद ही लड़ना होगा जंग को खुद ही लड़ना होगा। »

एक और निर्भया

बस कुछ दिन की बात है सब भूल जाएंगे काम – धन्धों में मशगूल हो जाएंगे नईं कहानी का शोर मचाएंगे फिर कोई और निर्भया होगी जीवन की जंग हार जाएगी कोई कुछ ना करेगा बस इक नाम और जुड़ेगा। »

आम का बाग़

भगवान् की कृपा से मैने आमों के पेड़ों से भरा इक घर पाया हरेक पेड़ ने अलग-अलग रंग रूप पाया सबका आकार अलग,महक अलग फ़िजा में अलग ही महक उठी जब पेड़ों पर बौर आया जब पेड़ों पर फल आया तो सब का मन ललचाया फिर सब आमों से स्वाद भी अलग-अलग आया फिर आमों ने मुझे भिन्न-भिन्न किरदारों से मिलवाया किसी ने मांगे आम खुद तो किसी के घर मैने भिजवाया बहुतों को स्वाद खूब भाया तो कुछेक के मन को छू नहीं पाया किसी ने भगवान ... »

नया समाज

चलो आज अपने घर को ऐसा घर बनाते हैं जिसमे बड़े पेड़ के नीचे , नए पौधों को पनपने का सुख दे, खुशी से जिंदगी बिताते हैं, चलो आज अपने घर को ऐसा घर बनाते हैं पुराने अनुभव, नई सोच को, एक दूसरे का पूरक बना, सबको आत्म सम्मान से जीना सिखाते हैं , अपने छोटे से प्रयास से नया समाज बनाते है चलो आज अपने घर को नया घर बनाते हैं। »

अन्न- दाता

आज हमारा जीवन रक्षक, अन्न- दाता कर्म भूमि छोड़ कर दर – बदर सड़कों पर, संघर्ष करता, गरीब हर साल और गरीब होता जाता, सदियों से हक के लिए लड़ता , हर बार ठगा जाता , आत्म हत्या का विकल्प चुनता, कितना बेबस,सुनता कौन, राजनीति की भेंट चढता आया, वोट बैंक दिग्भ्रमित करता , अब तो उम्मीद भी हारने लगा, भटके कभी इस छोर कभी उस छोर कोई रखता नही याद इसका बलिदान दुआ करो, कही इसकी नई पीढ़ी भूल ना जाए खेत खलिहान... »

मासूम बचपन

मासूम बचपन कुचला जा रहा भीतर से सहमा, बाहर से उददंड हुया बिखरता हुया , गैज़ेटस के तले , अपनों के स्नेह-सानिध्य से वंचित सहमा हुया, आयायों के तले , सर्वगुण- संपन्न बनाने की होड़ में भागता हुआ, मृग मरीचिका के तले , सम्भाल लो,बचपन के खजाने को, मासूम बचपन कुचला जा रहा। »

साँवरे

साँवरे, इसमें हमारा नही कोई दोष तुम्हारा ख्याल आते नही रहता होश हमारी तो क्या बिसात जब खयाल तेरा राधे को करता मदहोश। »

हिन्दी -भाषा

सीमित अक्षर, सीमित मात्राऐं रचा शब्दों का असीमित भण्डार बना विशाल वृन्द भरे शब्दकोश बेशुमार कैसा खेल रचाया है इन शब्दों ने महकाया काव्य दरबार वही शब्द संभावनाएं अपार क्षमता भरपूर भिन्न भाव अमिल सोच तीव्र जज़्बात विपरीत परिस्थितियां तीक्ष्ण नज़र अदृश्य विचार स्पष्ट दृष्टिकोण नित उदित नवीन रचनाएँ खिला कवि परिवार सजा साहित्य संसार बढ़ाया सम्मान हिंदी ने हिंद का बीच विश्व विशाल। सन्देश हर हिन्द वासी क... »

मानव तन

कुकडू -कडू कुकडू -कडू करता रहूँ , करता रहूँ मन में सोच रहा, मैं भी तो एक जीव हूँ, बांग से जगाता हूँ, महफ़िलों की शान हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, जल की मैं रानी हूँ, भून दी जाती हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, मैं-मैं करती हूँ, मन की भोली-भाली हूँ, मैं भी तो एक जीव हूँ, मन में सोचूं कभी मानव तन पाऊँ जब तेरे गर्भवती विनायकी के छल को देखूं ऐसा ही कर्म करूँ तो कभी ना मानव तन पाऊँ कुकडू -कडू कुकडू -कडू करता ... »

ख़तावार

जब सब के भीतर तु है समाया तब भी मुझे कैसे तु नजर ना आया ख़तावार हूँ मैं खुद को ना इसका पात्र बना पाया। »

लाॅकडाउन समय

लगता था जिंदगी बहुत बेमानी हो गई पहले-पहल ऐसे लगा कुछ छूट रहा यह जग सारा टूट रहा फिर कुछ दिन बीते मन शांत होने लगा छूटने का गम नहीं कुछ पाने की चाह हुई यह कुछ पाना कुछ और ना था खुद को ही जानने की चाह थी खुद में ही खोने की राह थी पहचाना स्वयं को,अब और क्या है बाकी जिंदगी अब बेमानी नही शान्त सी लगने लगी अब भीतर-बाहर कोई शोर नहीं मौन नदिया सी बहने लगी। »

चाय

कहते सर्दी में चाय की तलब बढ़ जाती है पर गर्मी में कौन सा कम हो जाती है। »

रचना की समीक्षा

रची जाती यहां, प्यारी-प्यारी रचनाऐं मन के भावों को दर्शाती सामाजिक मुद्दों पर जागरूक कराती संस्कृति का दर्शन करवाती मन को आनंदित कर जाती रचनाओं उपरांत, समीक्षा पढ़ने की बारी आती जिसमे समीक्षकों की भिन्न सोच दिखाई देती तो रचनाओं की गहराई जान पाती जो आनंद को दोगुना कर देती मैं भाव-विभोर हो जाती। »

बचपन

पल पल सोचूं कहाँ से ढूँढूं खुशियों की चाबी वो बचपन वाली मिल जाए तो फिर से जी लूँ । »

माया नगरी

यह माया नगरी बड़ा परदा लुभाती चकाचौंध रंगीली दुनिया ख्याली मंज़िल एक हादसा परत दर परत खुलते राज डरावने सच नकली चेहरे अंधी दौड़ सर्वोपरि माया धज्जियां उड़ाते रिश्ते बिछा माया जाल दिखा सपने देती चंद सितारे लील लेती आंखों के तारे। »

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