Anupam Mishra's Posts

मृगतृष्णा

रेत सी है अपनी ज़िन्दगी रेगिस्तान है ये दुनिया, रेत सी ढलती मचलती ज़िन्दगी कभी कुछ पैरों के निशान बनाती और फिर उसे स्वयं ही मिटा देती, कांटों को आसानी से पनाह देती फूलों को ये रेत हमेशा नकार देती, जो रह सकता है प्यासा उसे रखती, बाकियों को मृगतृष्णा में उलझा देती। दूर तक भी कोई नहीं नजर आता रेत ही रेत में सब ओझल हो जाता, प्यास से जब मन बावला होता है, हर मृगतृष्णा उसे अपना पराव लगता है, और एक कोने स... »

समन्दर

समन्दर का वो किनारा साथी है हमारा, जहां बैठ घंटों है वक्त हमने गुजारा, जैसे कि उनसे सदियों से नाता हो हमारा, बहुत बार तो मिलना नहीं हुआ है पर एक अनोखा रिश्ता सा कायम रहा है, मिलन का अनुभव हर बार उम्दा ही रहा है; उसकी लहरे खूब बतियाती हैं पास आके, कहती हैं, “आना जाना तो लगा रहेगा यूं ही, वक्त भी चलता रहेगा हर आने जाने के साथ ही, फिर भी, हर गमन पर दुख होगा उतना ही जितना की आगमन पर अपरिमित खुशी... »

पिंजरे में कैद पंछी

किसी पिंजरे में कैद पंछी की तरह जैसे हमारा मन भी कैद हो गया है, सामने खुली चांदनी नजर आती है पर चार दिवारियों के बाहर नहीं निकल पाती, कुछ रस्मों की दीवारें हैं कुछ मर्यादाओं की रेखाएं हैं और कुछ ऊसूलों की सलाखें हैं जिनको तोड़कर जाने की उम्मीद नहीं बस देखकर सुकून मिले अब वही सही, ऐसा नहीं कि भीतर जोश या हिम्मत नहीं पर यह सोचकर हूं मन को बांध लेती कि जब इस पंछी का अंत निश्चित है ही फिर क्यूं इसे खु... »

मैं हिन्दी हूं

मैं हिन्दी हूं भारत की भक्त हिन्दी, संस्कृत मेरी जननी जिसमें अंकित है संस्कृति, उस संस्कृति की अब मैं उत्तराधिकारणी, उद्धरित हुई मेरे संग कई और बहने भी, उर्दू, पंजाबी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी, हरियाणवी, गढ़वाली व दक्खिनी, पर बस गई सब अपनी नगर में ही, मैं ही कहीं एक जगह न बैठी रही, भारत के एक कोने से दूसरे कोने तक चलती रही, देश को एक कोने से दूसरे तक जोड़ती रही, प्रेम के पैगाम अपने संग लेकर चलती रही... »

पाखंड

अजीब नौटंकी लगा रखी है जमाने ने मेरी विकलांगता पर खुल के हंसते हैं और अपनी कमी को दिन रात रोते हैं; गिर पड़ी जब ठोकर खाकर पत्थर से अंधा बताकर हमे मज़े लेते रहे खूब वे पर जब खुद अंधे हुए धूल में चलने से अपने आप को गमगीन बेचारा बताते रहे। ©अनुपम मिश्र »

दर्द का उम्र

जीवन के इस सफर में टूटी हूं कई बार, घायल होकर दर्द में तड़पी हूं कई बार, पर हर दर्द का अपना हिसाब रहा, कोई बस तन पर एक दाग बन जमा रहा, और कोई टीस बनकर हृदय में चुभता रहा; कभी किसी पत्थर से हुई हमारी टकरार कभी घायल हुई लगके चाकू की नुकीली धार, गिरी हूं कई बार सीखते हुए सायकल सवार छलनी हुआ था बदन जब बसा था मेरा संसार, पर इन क्षणिक दर्दों का नहीं कोई भार, इनसे तो आई थी जीवन में हमारे बहार, उमर पड़ा थ... »

संभव-असंभव

सोच रही हूँ डालने को बालू समंदर में ताकि राह खुल जाये मुसाफिर की; अजीब दास्ता है ये, हो सकता नहीं ये संभव, पर है ये दुनिया असंभव को संभव करने वाली, हर सपने की है इसके पास चाभी निराली, लोगों ने तो चाँद मंगल तक की राह बना ली तो अब तो बस सपने देखने की ही थी देरी, क्या पता कब कौन सी चाभी हाथ लग जाये! ©अनुपम मिश्र »

अधूरापन

पूर्ण समृद्ध न तो मैं हूं और न ही कोई अन्य, सर्वज्ञ तो इस जहाँ में कोई भी नहीं, हर किसी में कुछ न कुछ रिक्तता है जैसे, किसी भी ह्रदय का ज्ञान सम्पूर्ण नहीं, और वही खालीपन उसे प्रेम करना सिखाता है; उस रिक्तता की पूर्ति को वो दिन रात भटकता है, जो उस खालीपन को दूर करता सा लगता है, हृदय उस साधन में तल्लीन सा हो जाता है, और उसे अपना अभिन्न हिस्सा मान लेता है; इस दीवानगी में कई बार ऐसा भी होता है, मरीचि... »

पल दो पल के शायर

हैं बहुत यहाँ एक से बढ़कर एक, है काबिलों की बस्ती ये जहाँ , हैं कितने ही माहिर आये यहाँ और आकर चले गए न जाने कहाँ, कोई रहा कहाँ एक वक़्त जीकर यहाँ, हर किसीको आकर फिर जाना ही पड़ा, चाहे वो कितना भी माहिर क्यों न रहा! पल दो पल के शायर दो शब्द सुनते हैं और दो शब्द कह जाते हैं पर उन्हीं चंद शब्दों में ज़िंदगी के कई मायने दे जाते हैं, वो किसी पुष्प का निराला रंग हो या अनछुआ सा कोई रस या गंध हो, चंद शब्दों ... »

समानता क्या है?

धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है, अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है, कौन किससे भला समान है? समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है छोटी सी झोपड़ी हो या ऊंची महल अटारी नहीं वो किसी समानता के अधिकारी पर दोनो का एक ही प्रयोजन है, अब भला नर हो या नारी दोनो की अपनी अपनी जिम्मेदारी, इसमें समानता असामनता की बात क्यूं आई? दोनो मिलकर ही तो सजाते जग की क्यारी अब जलाए अग्नि या बुझाए ज... »

शुरुआत जरूरी है

हो चाहे कैसी भी घड़ी, आंधी तूफ़ान की लगी हो लड़ी, या मन को झुलसा रही हो अग्नि, डर हो यदि आगे हार जाने की, या फिर अपना सब खो देने की, शुरुआत जरूरी है; महल खड़ी करने को, नीव बेहद जरूरी है, मीठे फल खाने को बीज बोना जरूरी है, अँधेरे को बुझाने को, लौ जलाना जरूरी है! बस पहला कदम जो ले लिए आगे कदम बढ़ते जायेंगे हर कांटे पत्थर को पार करते जायेंगे, अँधेरे राहों में भी रौशनी धुंध लेंगे, बस वो पहला कदम जरूरी है व... »