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  1. कवि अनुपम जी की यह कविता जिंदगी को रेत का उपमान देकर चित्रात्मकता का सुंदर समावेश कर रही है। पाठक के मन में सहज की रेत में बन रहे पैरों के निशान चित्र बनकर उभर सकेंगे। फिर चलती हवा से वही निशान मिटने लगते हैं। यह कविता रेत को जीवन से जोड़ने का दुरूह कार्य है। “मृगतृष्णा उसे अपना पराव लगता है,” में दार्शनिकता की झलक भी है। सरल और सहज भाषा का प्रयोग है, “हर रोज़ कई कहानियों को रेत में कैद कर” में अनुप्रास का अलंकरण सुन्दर का को बढ़ा रहा है। बहुत खूब कविता

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