धूल, कंकड़, पत्थर, पहाड़ सबकी अपनी शान है,
अपना मान है; हवा, जल, अग्नि सबकी अपनी पहचान है,
कौन किससे भला समान है?
समान कुछ नहीं यहां सबका बस अपना स्थान है
छोटी सी झोपड़ी हो या ऊंची महल अटारी
नहीं वो किसी समानता के अधिकारी
पर दोनो का एक ही प्रयोजन है,
अब भला नर हो या नारी
दोनो की अपनी अपनी जिम्मेदारी,
इसमें समानता असामनता की बात क्यूं आई?
दोनो मिलकर ही तो सजाते जग की क्यारी
अब जलाए अग्नि या बुझाए जल,
जलाए जल या बुझाए अग्नि
सबकी करनी अपनी अपनी,
इससे क्या फर्क पड़ता है कि
वो कौन से जिस्म में रहता है
फल तो सब कर्मों के ही भोगता है।
©अनुपम मिश्र
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