Archana Verma, Author at Saavan's Posts

तुम्हें माफ़ किया मैंने

तुम्हें माफ़ किया मैंने

जाओ तुम्हें माफ़ किया मैंने बस इतना सुकून है जैसा तुमने किया वैसा नहीं किया मैंने जाओ तुम्हें माफ़ किया मैंने हाँ खुद से प्यार करती थी मैं ज़रूर पर जितना तुमसे किया उस से ज़्यादा नहीं तुम्हारी हर उलझनों को अपना लिया था मैंने जाओ तुम्हें माफ़ किया मैंने तुम्हारी लाचारियाँ मज़बूरियाँ सब स्वीकार थी मुझको सिर्फ उस रिश्ते के खातिर जिस पर अपना सब कुछ वार दिया मैंने जाओ तुम्हें माफ़ किया मैंने तुमने जो वादे किय... »

हिंदी हम तुझ से शर्मिंदा हैं

हिंदी हम तुझ से शर्मिंदा हैं

आज कल ओझल हो गयी है हिंदी एसे महिलाओं के माथे से बिंदी जैसे कभी जो थोड़ा बहुत कह सुन लेते थे लोग अब उनकी शान में दाग हो हिंदी जैसे लगा है चसका जब से लोगों अंगरेजियत अपनाने का अपने संस्कारों को दे दी हो तिलांजलि जैसे अब तो हाय बाय के पीछे हिंदी मुँह छिपाती है मात्र भाषा हो के भी लज्जित हो रही हो जैसे है गौरव हमें बहुत आज एक शक्तिशाली देश होने का पर अपनी पहचान हिंदी को हमने भूला दिया हो जैसे आज हिंद... »

कई बार हुआ है प्यार मुझे

कई बार हुआ है प्यार मुझे

हाँ ये सच है, कई बार हुआ है प्यार मुझे हर बार उसी शिद्दत से हर बार टूटा और सम्भ्ला उतनी ही दिक्कत से हर बार नया पन लिये आया सावन हर बार उमंगें नयी, उमीदें नयी पर मेरा समर्पण वहीं हर बार वही शिद्दत हर बार वही दिक्कत हाँ ये सच है, कई बार हुआ है प्यार मुझे हर बार सकारात्मक रह बढ़ चला उसकी ओर जिसको देख यूँ लगा हाँ के अब शायद न टूटूँ उस तरह जिस तरह कभी टूटा था पर हर बार वही शिद्दत हर बार वही दिक्कत हाँ ... »

प्रकृति मानव की

प्रकृति मानव की

मेरी छाँव मे जो भी पथिक आया थोडी देर ठहरा और सुस्ताया मेरा मन पुलकित हुआ हर्षाया मैं उसकी आवभगत में झूम झूम लहराया मिला जो चैन उसको दो पल मेरी पनाहो में उसे देख मैं खुद पर इठलाया वो राहगीर है अपनी राह पे उसे कल निकल जाना ये भूल के बंधन मेरा उस से गहराया बढ़ चला जब अगले पहर वो अपनी मंज़िलो की ऒर ना मुड़ के उसने देखा न आभार जतलाया मैं तकता रहा उसकी बाट अक्सर एक दिन मैंने खुद को समझाया मैं तो पेड़ हूँ मे... »

नारी होना अच्छा है

नारी होना अच्छा है

नारी होना अच्छा है पर उतना आसान नहीं मेरी ना मानो तो इतिहास गवाह है किस किस ने दिया यहाँ बलिदान नहीं जब लाज बचाने को द्रौपदी की खुद मुरलीधर को आना पड़ा सभा में बैठे दिग्गजों को शर्म से शीश झुकाना पड़ा किसने दिया था अधिकार उन्हें अपनी ब्याहता को दांव लगाने का खेल खेल में किसी स्त्री को यूँ नुमाइश बनाने का था धर्मराज, तो कैसे अपना पति धर्म भूला बैठा युधिष्ठिर इतना तो नादान नहीं नारी होना अच्छा है पर उ... »

थोड़ा स्वार्थी होना चाहता हूँ मैं

थोड़ा स्वार्थी होना चाहता हूँ मैं

कल्पनाओं में बहुत जी चूका मैं अब इस पल में जीना चाहता हूँ मैं हो असर जहाँ न कुछ पाने का न खोने का उस दौर में जीना चाहता हूँ मैं वो ख्वाब जो कभी पूरा हो न सका उनसे नज़र चुराना चाहता हूँ मैं तमाम उम्र देखी जिनकी राह हमने उन रास्तों से वापस लौटना चाहता हूँ मैं औरों की फिक्र में जी लिया बहुत अब अपने अरमान पूरे करना चाहता हूँ मैं गुज़रा वख्त तो वापस ला नहीं सकता इसलिए अपने आज को सुधारना चाहता हूँ मैं चिं... »