Archana Verma, Author at Saavan's Posts

कुछ दिल की सुनी जाये

चलो रस्मों रिवाज़ों को लांघ कर कुछ दिल की सुनी जाये कुछ मन की करी जाये एक लिस्ट बनाते हैं अधूरी कुछ आशाओं की उस लिस्ट की हर ख्वाहिश एक एक कर पूरी की जाये कुछ दिल की सुनी जाये कुछ मन की करी जाये कोई क्या सोचेगा कोई क्या कहेगा इन बंदिशों से परे हो के थोड़ी सांसें आज़ाद हवा में ली जाये कुछ दिल की सुनी जाये कुछ मन की करी जाये बहुत रोका मैंने बहते मन की रफ्तारों को अब बहाव की ही दिशा में अपनी नाँव खींची ज... »

मनमर्ज़ियाँ

चलो थोड़ी मनमर्ज़ियाँ करते हैं पंख लगा कही उड़ आते हैं यूँ तो ज़रूरतें रास्ता रोके रखेंगी हमेशा पर उन ज़रूरतों को पीछे छोड़ थोड़ा चादर के बाहर पैर फैलाते हैं पंख लगा कही उड़ आते हैं ये जो शर्मों हया का बंधन बेड़ियाँ बन रोक लेता है मेरी परवाज़ों को चलो उसे सागर में कही डूबा आते हैं पंख लगा कही उड़ आते हैं कुछ मुझको तुमसे कहना है ज़रूर कुछ तुमसे दिल थामे सुनना है ज़रूर खुल्लमखुल्ला तुम्हे बाँहों में भर अपनी धड़कन... »

गाडी के दो पहिए

मैं स्त्री हूँ , और सबका सम्मान रखना जानती हूँ कहना तो नहीं चाहती पर फिर भी कहना चाहती हूँ किसी को ठेस लगे इस कविता से तो पहले ही माफ़ी चाहती हूँ सवाल पूछा है और आपसे जवाब चाहती हूँ क्या कोई पुरुष, पुरुष होने का सही अर्थ समझ पाया है या वो शारीरिक क्षमता को ही अपनी पुरुषता समझता आया है?? हमेशा क्यों स्त्रियों से ही चुप रहने को कहा जाता है जब कोई पुरुष अपनी सीमा लाँघ किसी स्त्री पर हाथ उठता है कोई कम... »

वो पुराना इश्क़

वो इश्क अब कहाँ मिलता है जो पहले हुआ करता था कोई मिले न मिले उससे रूह का रिश्ता हुआ करता था आज तो एक दँजाहीसी सी है, जब तक तू मेरी तब तक मैं तेरा शर्तों पे चलने की रिवायत सी है , मौसम भी करवट लेने से पहले कुछ इशारा देता है पर वो यूं बदला जैसे वो कभी हमारा न हुआ करता था मोहब्बत में नफरत की मिलावट कहा होती है जो एक बार हो जाये तो आखिरी सांसो तक अदा होती है मुझे बेवफा करार कर बखूबी पीछा छुड़ाया उसने उ... »

किराये का मकान

बात उन दिनों की है जब बचपन में घरोंदा बनाते थे उसे खूब प्यार से सजाते थे कही ढेर न हो जाये आंधी और तूफानों में उसके आगे पक्की दीवार बनाते थे वख्त गुज़रा पर खेल वही अब भी ज़ारी है बचपन में बनाया घरोंदा आज भी ज़ेहन पे हावी है घर से निकला हूँ कुछ कमाने के लिए थोड़ा जमा कर कुछ ईंटें उस बचपन के घरोंदे में सजाने के लिए यूं बसर होती जा रही है ज़िन्दगी अपने घरोंदे की फ़िराक में के उम्र गुज़ार दी हमने इस किराये क... »

रुक्मणि की व्यथा

श्याम तेरी बन के मैं बड़ा पछताई न मीरा ही कहलाई न राधा सी तुझको भायी श्याम तेरी बन के मैं बड़ा पछताई न रहती कोई कसक मन में जो मैं सोचती सिर्फ अपनी भलाई श्याम तेरी बन के मैं बड़ा पछताई सहने को और भी गम हैं पर कोई न लेना पीर परायी श्याम तेरी बन के मैं बड़ा पछताई न कोई खबर न कोई ठोर ठिकाना बहुत देखी तेरी छुपन छुपाई श्याम तेरी बन के मैं बड़ा पछताई लोग लेते तुम्हारा नाम राधा के साथ मीरा को जानते हैं तुम्हार... »

देखो फिर आई दीपावली

देखो फिर आई दीपावली, देखो फिर आई दीपावली अन्धकार पर प्रकाश पर्व की दीपावली नयी उमीदों नयी खुशियों की दीपावली हमारी संस्कृति और धरोहर की पहचान दीपावली जिसे बना दिया हमने “दिवाली” जो कभी थी दीपों की आवली जब श्री राम पधारे अयोघ्या नगरी लंका पर विजय पाने के बाद उनके मार्ग में अँधेरा न हो क्योंकि वो थी अमावस्या की रात स्वागत किया अयोध्या वासियों ने उनका सैकड़ों दीप जलाने के साथ लोगों के हर्ष... »

सिर्फ तुम्हारी

जब तुम आँखों से आस बन के बहते हो उस वख्त तम्हारी और हो जाती हूँ मैं लड़खड़ाती गिरती और संभलती हुई सिर्फ तुम्हारी धुन में नज़र आती हूँ मैं लोगो की नज़रो में अपनी बेफिक्री में मशगूल सी और भीतर तुम में मसरूफ खूद को पाती हूँ मैं वो दूरियां जो रिश्तो को नाकामयाब कर देती हैं उन दूरियों का एहसान मुझ पे, जो खुद को तुम्हारे और करीब पाती हूँ मैं सारे रस्मों रिवाज़ो को लांघ कर बंधन जो तुमसे जुड़ा अब उसी को अपना ... »

मुझे अपने साथ ले चलो

तुम न आ सको तो मुझे अपने साथ ले चलो इत्र बन कर मेहकती रहूंगी तुम्हारे बदन की खुशबू के साथ तुम न आ सको तो मुझे अपने साथ ले चलो रुमाल बन कर, तुम्हारे माथे को चूम लूंगी ,जब करनी हो बात तुम न आ सको तो मुझे अपने साथ ले चलो घड़ी बन कर, लिपटी रहूंगी तुम्हारी धड़कनों के साथ तुम न आ सको तो मुझे अपने साथ ले चलो फ़ोन समझ कर, मुझे थामे रखना अपने हाथों के साथ तुम न आ सको तो मुझे अपने साथ ले चलो चादर बन कर, ओढ़ लेन... »

ज़िद्दी ज़िन्दगी

ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है कभी मेरी सुनती नहीं बस अपनी ही सुनाती है… कभी जो पूछू सवाल उस से,माँगा करू जवाब उस से बस वो धीरे से मुस्कुराती है ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है… कई बार बतलाई अपनी ख्वाहिशे उसको , इल्तजा भी की कोई जो पूरी कर दो वो मेरी अर्ज़ियाँ मुझको ही वापस भिजवाती है ज़िन्दगी मुझ से बस अपनी ही मनवाती है … मुझसे कहती है आज न सही, कल पूरी कर दूंगी ख्वाहि... »

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