Archana Verma, Author at Saavan's Posts

मेरा श्रृंगार तुमसे

दर्पण के सामने खड़ी होकर, जब भी खुद को सँवारती हूँ उस दर्पण में तुमको साथ देख,अचरज में पड़ जाती हूँ शरमाकर कजरारी नज़रें नीचे झुक जाती हैं पर कनखियों से तुमको ही देखा करती हैं यूं आँखों ही आँखों में पूछ लेती है इशारों में बताओ कैसी लग रही हूँ इस बिंदिया के सितारों में मेरी टेढ़ी बिंदी सीधी कर तुम जब अपना प्यार जताते हो उस पल तुम अपने स्पर्श से, मुझसे मुझको चुरा ले जाते हो ये पायल चूड़ी झुमके कंगन सब दे... »

शिवांशी

मैं शिवांशी , जल की धार बन शांत , निश्चल और धवल सी शिव जटाओं से बह चली हूँ अपने मार्ग खुद ढूँढती और बनाती आत्मबल से भरपूर खुद अपना ही साथ लिए बह चली हूँ कभी किसी कमंडल में पूजन को ठहर गई हूँ कभी नदिया बन किसी सागर में विलय हो चली हूँ जिस पात्र में रखा उसके ही रूप में ढल गई हूँ तुम सिर्फ मेरा मान बनाये रखना, बस इतनी सी इच्छा लिए तुम्हारे संग बह चली हूँ मुझे हाथ में लेकर जो वचन लिए तुमने उन वचनों को... »

मेरे जैसी मैं

मैं कहाँ मेरे जैसी रह गयी हूँ वख्त ने बदल दिया बहुत कुछ मैं कोमलांगना से काठ जैसी हो गई हूँ मैं कहाँ मेरे जैसी रह गयी हूँ समय के साथ बदलती विचारधारा ने मेरे कोमल स्वरुप को एक किवाड़ के पीछे बंद तो कर दिया है पर मन से आज भी मैं वही ठहरी हुई हूँ मैं कहाँ मेरे जैसी रह गयी हूँ पहले मैं सिर्फ घर संभाला करती थी वख्त आने पे रानी रानी लक्ष्मी बाई बन दुश्मन को पिछाडा करती थी आज मैं एक वख्त में दो जगह बंट गई... »

करम

मेरे महबूब का करम मुझ पर जिसने मुझे, मुझसे मिलवाया है नहीं तो, भटकता रहता उम्र भर यूं ही मुझे उनके सिवा कुछ भी न नज़र आया है लोग इश्क में डूब कर फ़ना हो जाते हैं पर मैंने डूब करअपनी मंजिलों को रु ब रु पाया है मेरे महबूब का करम मुझ पर जिसने मुझे मुझसे मिलवाया है कब तक हाथ थामे चलते रहने की बुरी आदत बनाये रखते क्योंकि, इस आदत के लग जाने पर कोई फिर,खुद पर यकीन न कर पाया है मेरे महबूब का करम मुझ पर जिसन... »

आँखों का नूर

कल उस बात को एक साल हो गया वख्त नाराज़ था मुझसे न जाने कैसे मेहरबान हो गया मेरी धड़कन में आ बसा तू ये कैसा कमाल हो गया कल उस बात को एक साल हो गया रोज़ दुआ भी पढ़ी और आदतें भी बदली सिर्फ तेरी सलामती की चाहत रखना मेरा एक एकलौता काम हो गया कल उस बात को एक साल हो गया सिर्फ तू ही मेरे साथ रहे तुझे किसी की नज़र न लगे सारे रिश्ते एक तरफ सिर्फ तुझसे मिला रिश्ता मेरी पहचान हो गया कल उस बात को एक साल हो गया जब त... »

दोस्ती

चलो थोडा दिल हल्का करें कुछ गलतियां माफ़ कर आगे बढें बरसों लग गए यहाँ तक आने में इस रिश्ते को यूं ही न ज़ाया करें कुछ तुम भुला दो , कुछ हम भुला दें कड़ी धूप में रखा बर्तन ही मज़बूत बन पाता है उसके बिगड़ जाने का मिटटी को क्यों दोष दें कुछ तुम भुला दो , कुछ हम भुला दें यूं अगर दफ़न होना होता ,तो कब के हो गए होते सिल लिए थे कई ज़ख़्म हम दोनों ने , तब जा के ये रिश्ते आगे बढें कुछ तुम भुला दो , कुछ हम भुला दें... »

छल

छल और प्यार में से क्या चुनूँ जो बीत गया उसे साथ ले कर क्यों चलूँ पतंग जो कट गई डोर से वो खुद ही कब तक उड़ पायेगी हालात के थपेडों से बचाने को उसको फिर नयी डोर का सहारा क्यों न दूं जो शाख कभी फूलों से महकी रहती थी वो पतझड़ में वीरान हो चली है उसे सावन में फिर नयी कोपल आने का इंतजार क्यों न दूं छल चाहे जैसा भी हो , उसे ढोना भारी हो जाता है आधा सफ़र तो कट गया , पर रास्ता अभी लम्बा है उस भार को यहीं उतार... »

वख्त

वख्त जो नहीं दिया किसी ने उसे छीनना कैसा उसे मांगना कैसा छिनोगे तो सिर्फ २ दिन का ही सुख पाओगे और मांगोगे तो लाचार नज़र आओगे छोड़ दो इसे भी वख्त के हाल पर जो जान कर सो गया , उसे जगाना कैसा वख्त जो किसी के साथ गुज़ार आये उसका पछतावा कैसा उसका भुलावा कैसा पछता के भी बीते कल को न बदल पाओगे पर भूल कर उसे ज़रूर एक नया कल लिख पाओगे तोड़ लो बीते कल की जंजीरों को ये सर्पलाता है , इनसे लिपट कर, जीना कैसा वख्त त... »

इश्क का राज़ीनामा

काश इश्क करने से पहले भी एक राज़ीनामा ज़रूरी हो जाये जो कोई तोड़े तो हो ऐसा जुर्माना जो सबकी जेबों पर भारी हो जाये फिर देखो बेवज़ह दिल न फिसला करेंगे इश्क की गलियों से बच- बच निकला करेंगे वो ही पड़ेगा इसके चक्करों में, जो सारी शर्तों को राज़ी हो जाये कोई मनचला किसी कॉलेज के बाहर न दिखेगा कोई दिल बहलाने को कुछ यूं ही न कहेगा जिसे निभाना उसकी हैसियत से बाहर हो जाये भटके है जो बच्चे छोटी सी उम्र में दूध के... »

बारिश

बारिश से कहो यूं न आया करे मुझे तेरा उनके बगैर आना अच्छा नहीं लगता तूने आने से पहले दस्तक तो दी थी सर्द मौसम में भिगोने की जुर्रत तो की थी जितना चाहे रिझा ले मुझको रूमानी हो के मुझे उनके बिना भीगना अच्छा नहीं लगता मुझे तेरा उनके बगैर आना अच्छा नहीं लगता दिल्ली की हवा सिली सी हो गई है जलाई थी जो लकडियाँ वो गीली सी हो गई है शीशों पे पड़ी ओस पर इंतजार लिखना, अच्छा नहीं लगता मुझे तेरा उनके बगैर आना अच्... »

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