अगर है शौक़ कविता का तो ये उलझन ज़रूरी है !
किसी के प्यार में क़ुरबान हो जीवन ज़रूरी है !!
कई एक रोज़ से मॉ ने मेरा माथा नही चूमा !
मेरे माथे को मेरी मॉ का एक चुम्बन ज़रूरी है !!
अगर है शौक़ कविता का तो ये उलझन ज़रूरी है !
किसी के प्यार में क़ुरबान हो जीवन ज़रूरी है !!
कई एक रोज़ से मॉ ने मेरा माथा नही चूमा !
मेरे माथे को मेरी मॉ का एक चुम्बन ज़रूरी है !!
सुखों का रास जो रच ले वही मधुवन ज़रूरी है !
लबों की प्यास जो रख ले वही सावन ज़रूरी है !!
बहुत हम बंट के रह आए हमें ये सोचना होगा !
जहॉ सब मिलके अब बैठें वही आंगन ज़रूरी है !!
प्रीति जलती है आग की तरह !
और बजती है राग की तरह !!
प्रेम की फ़स्ल आज के इंसा !
काट देते हैं साग की तरह !!
सामूहिकता से मिटे दुनिया के हर शूल !
निजता में सब बांटके करते भारी भूल!!
हजारो लोग तम लेकर, निगलने दौड़ पड़ते हैं !
अगर एक ज्योति हल्की सी, कहीं दिखलाई पड़ती है
सुकूं का बदन आज खस्ता बहुत है !
लुटेरों का दुनिया में दस्ता बहुत है !!
है सब कुछ यहॉ पर अभावों का ताना !
मिले कुछ नही पर व्यवस्था बहुत है !!
पाप पुण्य कुछ भी नही, ऐसा हुआ जहान!
पैसा ही भगवान है पैसा ही ईमान !!
आजकल देवता और दनुज कुछ नही !
ज्येष्ठ भ्राता सखा या अनुज कुछ नही !!
एक दूजे को सब लूटने पर लग गए !
अब किसी से रहा कोई जुज कुछ नही !!
गांव गांव में नगर नगर में बीमारी !
यज्ञ हवन में धूप अगर में बीमारी !!
निजपूँजी के हवस ने ऐसा कर डाला!
वही लुटेरी डगर डगर में बीमारी !!
जिसको प्यार सिखाया मैने !
राह सही दिखलाया मैने !!
आज वही है जान का दुश्मन !
अपना जिसे बनाया मैने !!
कोई अपना बनाना चाहता है!
मुझे दिल से लगाना चाहता !!
जीस्त को देके गहरा प्यार यारो!
मुद्दतो फिर भुलाना चाहता है!!
आर्य हरीश कोशलपुरी
आर्य हरीश
जिलासचिव -प्रलेस अ० न०
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