उन्हें पाने की कोशिश में हम खुद को बुलाते गए हम दिल लगाते गए वो दिल जलाते गए
उन्हें पाने की कोशिश में हम खुद को बुलाते गए हम दिल लगाते गए वो दिल जलाते गए
सिर न झुकाना अपना फर्ज की राह में क्योंकि सर तो झुकेगा सिर्फ खुदा की पनाह में
हिमराज के सौंदर्य रीझे तपस्विनी सी बैठी थी नजर को अपने बनाई थी सारंग शीलीमुख नजरे ऐठे थी स्वेत वस्त्र वो करे थी धारण वनमाला गल पहने थी राजमुकुट सी धरे थी सीस पे लालू […]
खूब खेली मोहन मेरे दिल से होली नैनों से नींदो की कर ली है चोरी तुझसे मिलने पहले मैं थी चित् कोरी अब चित मेरा तुझ में ना मिले कोई ठोरी तू आकर मिले ना […]
हंसों के झुंड में बगुलु की आबादी बूंदों ने की है बादलों से शादी बैठे हैं बनकर हम कब से मुरादी एक बार दीदार दे दे वो महलों की शहजादी
मैं कैसे उड़ा गुलाल जब भी हिंसा का धुआं उड़ रहा है मैं कैसे जलाऊं होली जब मेरा देश चल रहा है मैं कैसे खेलू रंग की होली जब हर जगह तो रक्त पड़ा है […]
दिल जलाया है हमने एक शमा बनाकर उजाला जो करना था तेरे मोहब्बत के आशियाने में
हर किसी से मोहब्बत की यू ही हांमियां भरना ठीक नहीं दिल लगाकर दिल तोड़ने की गुस्ताखियां करना ठीक नहीं मेरी मोहब्बत का तो खुद हाफिज गवाह है मेरी पाक मोहब्बत की यू बदनामियां करना […]
मैं कैसे मोहब्बत को दूं झुकने जब मेरा मेहरम मुझ में मैं उसमें
कल्पना का कला की छाया नहीं थी सत्य पांव पसार रहा था रण भूमि की दहलीज पर जाकर दुश्मन को ललकार रहा था दुश्मन की आंखों में देखें कितनी होशियारी है पीठ पर बिस्तर बांध […]
नगर कुमारी देख कर बोली करूप है कोयल काली मेरे उपवन आकर लजाए बैठी कदंब की डाली मैं सुर के सिंगार से सजती भले रंग मेरा काला अभूषण के सिंगार सजे तू पहन वैजयंती माला […]
जब शब्दों के बाण चलाने में मर्यादा ना लागी जाए जब सभी मन में प्राण यह ले ले किसी और का हक ना खाएं जात-पात और ऊंच-नीच के जब सभी भेद मिटा दिए जाए तब […]
तुझसे मोहब्बत से पहले क्या पता था मुझे मेरे प्यार की अर्जी या एक साथ रद्द होगी रोज लेता है मेरी मोहब्बत का इंतिहान तेरे शक के कोई एक हद तो होगी
मान लिया खुद को खुदा ले आलम को आगोश में वो खाता खा गए खजालत के ढंग मे खजालत-लजजा
मेरी भोली सी कविता कहीं खो सी गई है उसकी मासूम हंसी आंखों से ओझल हो सी गई है ये खोई है तर्क वितर्को मैं इस गद भाषा के फर्को में आज के इस दर्द […]
मेरी कब्र को बनाना शमशान की दहलीज पे सुना है वहां सब अच्छे लोग रहते हैं मुझे देना है पहरा उन सभी काफिरों से जिन से दुखी ये जिंदा लोग रहते हैं जीवन भर गालियां […]
सूरज ने जलन की धूप से जलाया धरा को तो बादलों ने प्रेम वर्षा कर आ कर पुचकारा जब वृक्षों से छीन लिया पतझड़ ने शृंगार तो बहारों के पुष्पों ने आकर दुलारा जब दुख […]
मजाक ना बनाना कभी फक्कड़ फकीर का राज जाने बैठा है वह जीवन की लकीर का साधारण लिवाज मे क्या जानोगे उसकी हस्ती एशो आराम छोड़ आया है वह अपनी तकदीर का
अलग ही सुकून है खुदा की दिखाई राह में ऊंचा उठा दिया है मेहरम निगाह
लाखो दर्द सहकर भी रहते हैं खामोश जिंदगी बिता दी तुम्हारी तकदीर बनाने में जिनकी एक हंसी देखने को तरसती है मेरी निगाहें तुम 1 मिनट लगाती हो उनको रुलाने में
मैं कहती हूं बिल्कुल गरीब है तू यह जानकर कि तुझ पर संपत्ति विराट है दौलत से नहीं जो दिलों से राज करें वही तो असल में होता सम्राट है
आब ए चश्म की नुमाइश ना आंखें करें मेरी एहतियात से दूर करें अख्ज की भीड़ को आफताब की किरण भी ना छू सके मुझे अकिबत की फिक्र है दिल अजीज को
ना जाने क्यों लड़ते रहते हैं लोग जिंदगी बिताते हैं एक दूसरे पर रोष में ना जाने क्यों सभी भूल जाते हैं एक दिन सोना होगा मौत के आगोश में
आकाश से पाताल की होगी बातें पर बातों का कोई भी तर्क ना होगा जो शब्दों के सागर से ढूंढे ना मोती तो मुझ में और मुझमे फर्क क्या होगा
रूहानियत नहीं रही अब तेरे अल्फाजों में क्या करें मौत तगाजए ने तुझे रह ही बना दिया
तीय विलापम में शुद्ध अपनी विषारी शक्तिहीन हुए शक्तिशाली विलाप में भयानक रूप धरा था शांत करें ब्रम्हा और त्रिपुरारी त्राहि-त्राहि हो सर्वत्र नटराजन बदले नक्षत्र बलशाली भी भय से कँपे शिव के सामने उठे […]
एक दिन धरा की गोद में डाला मैंने अंकुरित बीज जैसे ईश्वर बांधे खग को मातृत्व ताबीज उस बीज को जल दे देती हो जान कभी अनजान फिर उस नन्हे शिशु में देखो दो दिन […]
मुझे कैद गुलामी पसंद नहीं मुझे उड़ने दो मुझे उड़ना है इस अंबर की रणभूमि में मुझे खोल के पंख उतरना है मेरा जीता जीवन मृत् हो गया घर की चार लकीरों में मैं उड़ […]
मुझे कैद गुलामी पसंद नहीं मुझे उड़ने दो मुझे उड़ना है इस अंबर की रणभूमि में मुझे खोल के पंख उतरना है मेरा जीता जीवन मृत् हो गया घर की चार लकीरों में मैं उड़ […]
जहां झर झर झर झर झरने की आवाज की गुंजन होती हो जहां धरती निज संतानों को यूं देख मनोरंजित होते हो मेरा जी करता वहां जाऊं मैं कहीं काश वह बस जाऊं मैं बैठूं […]
जब महाशक्ति का स्वागत होगा ढोल नगाड़े करेंगे गुंजन विशिष्ट परिधान में होगा मनोरंजन तिलक लगाकर करेंगे अभिनंदन सब कुछ परंपरागत होगा जब महाशक्ति का स्वागत होगा सुरक्षाबलों का होगा घेरा मीडिया का भी लगेगा […]
इस लेखनी से लेख लिखे तो श्याम रचे मतवाले इस लेखनी से पल में धराधर अपने केस सवारे इस लेखनी ने लिख दिखाइ रामायण की गाथा भारत के इतिहास को इस बिन कोई जान न […]
हर अखबार की खबर में देखो शाहीन बाग का केस है सुत का शव गोदी ले बैठी कैसी ममता का वेश है उस जगह की राह को घेरा जहां राह की तंगी है CAA के […]
जीवन को बिताता है बेमतलब के दिखावे में तो स्वार्थ के बिछड़ने कहीं तेरी किस्मत सोएगी जब कर्म ब्रह्म लेखनी एक माला में पिरोए गी तो आडंबर की होड़ डोर थाम के ना होएगी कर […]
देख के जी कांप उठा पुलवामा की राह को बोलो कौन थाम पाएँ बेसहारा बाह को त्रिनेत्र खोल बैठे तेरी ओछी चाल पे भाग काल नाचता है तेरे अब कपाल पे ब्याह नहीं मेरा देश […]
लहरों से टकराने का दावा करने वाले अक्सर अपने ही आंसुओं में डूब जाते हैं हमने जो पूछा क्यों गम शुदा हो तुम तो हम से ही जाने क्यों रूठ जाते हैं
निशा अंधेरी काली घाटी है तेरे काले केश केशो में फिर हीम के मोती खूब सजाया वेश ओस का चुनर ओढ़ के बैठे लोचन घुंघट डाला कलानरेश ने आके रची है ये पर्वत की बाला […]
जोगन बनके भटक रही है एक यौवन की मारी है तेरे मंदिर में नाच रही है वो महलों की नारी है मीरा नाम है पीड़ा पुकारे उसे नगर के वासी हैं काली कमली ओढ़ के […]
सुनहरी किरण जब मेरी खिड़कियों से झांकती हैं सीमेंट देती हूं पर्दे को मैं भी खिड़कियों के पट खोल के स्वागत है आपका कहती हूं रख देती है मेरे मुंह पर अपने अदृश्य हाथों को […]
महबूब वतन की रक्षा को शमशीर उठाया करते हैं कोई पूछे मोहब्बत कितनी है दिल चीर दिखाया करते हैं
उनके कदम लड़खड़ाने लगे हैं जिसने चलना सिखाया था तुझको अपने कंधों का सहारा देना जिसने कंधों पर बिठाया था तुझको तू फंसा हुआ आडंबर में तू होड़ करें है कमाई की अपनी सब शौक […]
मेघ की गोदी से गिरती बूंद बन कर देखना मिलता है आशीष शीतलता में घुल कर देखना
यह मंच कला को सौंपा है इसे कलंकित करना ठीक नहीं मासूम कला की बस्ती को दुख रंजित करना ठीक नहीं रंजित-राशि
कितना सरल था गांव का जीवन गले में चुन्नी बाल में रीवन बेरी के नीचे बच्चों की भीड़ थी बुजुर्ग परिवार की एक दृढ़ रीड थी दादा की ज्ञान की महफिल का लगना आंख बचाकर […]
सियासी खेल रचाया जा रहा है कुर्सी पाने के चक्कर में उंगली पर सबको को नचाया जा रहा है यहां रेस लगी है कुर्सी की हाथी, साइकिल और सेना की तोपों को सजाया जा रहा […]
देखन कि जब उठी लालसा देखा आँखे मीदं कालचक्र पर बिछा के पलका सोया था गोविंद
हाथों को अपने फैलाकर के बाबूजी दे तो कहता हूं कभी मेरे मुंख को देख जरा मैं रोता बिलकता रहता हूं उन ठंडी सीत हवाओं मे उन कड़कती काली घटनाओं में मैं डरा सहमा सा […]
कंचन सो तेरो रंग री बावरी मुख पे कमल की लाली है हंसों का सिरताज ले बैठी अब भी झोली खाली है चीर सरोवर तल में झांकें तू तो बड़ी मतवाली है कहते सब संसार […]
नारी ने चाहा की पर्दा प्रथा दूर हो उससे पर लोग हंस रहे हैं उसे बेपर्दा करके 👩🏫👩🔧👩🏭👩🔬👩🚀👮♀👷♀👸👱♀🤰🤱 आखिर क्यों
जटायु अंत में आंखें खोले हाथ जोड़ के करे वंदना रोता रोता बोली जटायु अपनी आंखें खोले जल जो पीले तो वह नहीं पीता राम बचा लो दुखी है सीता भक्ति रस में डुबके देखो […]
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