Priya Gupta's Posts

मां

एक मां ही तो है जो अब भी अपनी लगती है वरना इस परायी दुनिया में कौन अपना है »

जिंदगी

इक इक दिन करके जिंदगी गुजर गयी फूल सी जिंदगी कांटो में ढल गयी »

आग की तरह

तुम मुझे अपनी वाणी से हताहत कर सकते हो अपनी गंदी नजरों से मुझे काट सकते हो अपनी नफ़रत से मुझे मार सकते हो लेकिन मैं हर बार ऊठूंगी आग की तरह »

कहीं कोई इक लफ़्ज ही खिल जाये

कोई आफ़ताब तो नहीं जिंदगी में कहीं कोई दीया ही जल जाये कोई कविता हम कह नहीं पा रहे है कहीं कोई इक लफ़्ज ही खिल जाये »

जम जाते है क्यों रिश्ते बर्फ़ की तरह

सोचता हूं कभी कभी क्यों हो जाते है शुष्क जम जाते है क्यों रिश्ते बर्फ़ की तरह लेकिन तभी लुड़क पडते है गर्म गर्म आंसू नर्म रुखसारों पर पिघल जाती है सारी बर्फ़ रिश्तों की | »

रंगीन दुनिया में अब बस लहू नजर आता है

रंगीन दुनिया में अब बस लहू नजर आता है

न चिराग नजर आता है, ना आफ़ताब नजर आता है भीड है चारों तरफ़ मगर, ना कोई इंसान नजर आता है रंगो की ख्वाहिश थी इस दिल को दुनिया मे बिखेरने क़ि क्या करे रंगीन दुनिया में अब बस लहू नजर आता है »

……….चाहत होती है!

पराये जज्बातों को अपना बनाने की चाहत होती है किसी की आहों में डूब जाने की चाहत होती है उम्र भर चलते रहे तनहाईयों के साथ हम उनके साथ चंद कदम चलने की चाहत होती है »