बेगाने है वो तो फिर अपने से लगते हैं क्यों,
आने से उनके मौसम आख़िर बदलते हैं क्यों।
आँखों में जो जम गए थे हिज्र 1 के आँसू,
वस्ल 2 के वक्त वो आख़िर पिघलते हैं क्यों।
नहीं है अगर उनको हमारी-सी मोहब्बत,
इश्क़ से हमारे वो इतना जलते हैं क्यों।
हमारे दीदार 3 से अगर इतने परेशाँ हैं वो,
दरीचे4 में हर रोज़ आख़िर मिलते हैं क्यों।
मान लूँ कि नहीं है उनसे नायाब मोहब्बत,
ज़िंदगी से ज़्यादा वो आख़िर लगते हैं क्यों।
हर कोई जुड़ा है इस जहाँ में मोहब्बत से,
न हो इश्क़ जमीं से, बादल बरसते हैं क्यों।
1. विरह; 2. मिलन; 3. मुलाक़ात; 4. खिड़की।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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