बेवजह उनका नाम बार-बार याद आता है,
ज़ेहन में जमा दर्द आँखों में पिघल जाता है।
अब निगाहों ने भी पकड़ ली है दिल की राह,
अनजाने चेहरों में भी बस तू नज़र आता है।
जब भी तनहा होता हूँ, पूछता हूँ ख़ुद से,
इस भीड़ में ख़ुद को क्यूँ तू अकेला पाता है।
वो कई दफ़ा करते रहे वादा-ए-वस्ल1 मुझसे,
लेकिन हर दफ़ा वो वादे से मुकर जाता है।
ख़ाक ही है अंजाम हर अफ़साने2 का अगर,
फिर क्यूँ हैरान है ग़र परवाना जल जाता है।
ज़ेहन में जब भी अब्र-ए-ख़्याल3 उमड़ते हैं,
आसमाँ का बादल जाने क्यूँ बरस जाता है।
1. मिलन का वादा; 2. कहानी; 3. विचारों के बादल।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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