कहने को तो बस
मेरे दिल ने , तेरे दिल पे
कुछ भरोसे ही तो किए थे
शिकायत भी किस कचहरी करूँ
तेरे आस्मानी वादों की रसीदी टिकट पे
अरमानो के लहू से दस्तखत जो नही किए थे
…… यूई विजय शर्मा
कहने को तो बस
मेरे दिल ने , तेरे दिल पे
कुछ भरोसे ही तो किए थे
शिकायत भी किस कचहरी करूँ
तेरे आस्मानी वादों की रसीदी टिकट पे
अरमानो के लहू से दस्तखत जो नही किए थे
…… यूई विजय शर्मा
चला जाता है कोई दूर ,दिल के पास रहता है ,
वही यादें ,वही खुशबू ,वही एहसास रहता है .
फ़कत इतना फरक है प्रेम के इन दो मिलापो में ,
की जब वो दूर होते है तो ग़म ये साथ रहता है ..
…atr
खत को मेरे संभाल के रखा जो होता मीर,
हर हर्फ़ मेरे प्यार की दास्ताँ कहते .
करे अब किस जगह रोशन गुलिश्ता ए जिगर को यार ,
यहाँ तो आशियाँ ही लुट गया है मीर तूफां में .
…atr
किया है खून रिश्तो का , तुम्हे कातिल कहूँ या भ्रम ,
जला कर प्रेम का दीपक , अँधेरा कर दिया कायम .
…atr
न देखोगे मुझे अब तुम , न अब संवाद होगा ..
जो कल था ,आज तक जो था , न इसके बाद होगा ..
…atr
लहरा रहा है सामने यादों का समंदर ,
जो डूबना भी चाहूँ तो किस किनारे से..
मेरे इश्क़ की दास्ताँ बस इतनी है,
तलाश हमसफ़र की थी मुकाम तन्हाई का मिला.
…atr
मुद्दत से तेरी आँखों में नमी नहीं देखी,
लगता है तुमने मुझमे कोई कमी नहीं देखी ..
यादों की लहरों पर किया है प्यार का सफर ,
हमें है राब्ता उनसे उन्हें नहीं मेरी खबर..
…atr
आँखों से झरते आंसू ने थमकर पूछा,
आखिर सजा क्यों मिली मुझे ख़ुदकुशी की?
दिल रो पड़ा पुराना जखम फिर हरा हुआ,
कहा, गुनाह उसी ने किया जिस छत से तू गिरा ..
..atr
बर्बादी किसे दिखेगी हमारी जहाँ में मीर ,
लुटने के बाद ग़म का खज़ाना जो पा लिया ..
मुझको तेरी कमी तो सताती ही है मगर ,
तू दूर जा के खुश है ये सुकून की बात है .
…atr
अगर तुम बन गयी दीपक तुम्हारी लौ बनूँगा मैं,
नदी के शोर में शायद तुम्हारी धुन सुनूंगा मैं.
तुम्हारी याद में अक्सर यहाँ आंसू टपक पड़ते,
ये मोती है मेरे प्रीतम मगर कब तक गिनूंगा मैं…
..atr
तू ही दौलत मेरे दिल कि तू ही मेरा खज़ाना है,
मेरे दिल में मेरे साक़ी तेरा ही गुनगुनाना है.
चलो अब देखते है फिर मुलाक़ातें कहाँ होंगी ,
कहीं तुमको भी जाना है कहीं हमको भी जाना है..
….atr
आज फिर जी भर के मुझको पिलाओ यारो,
मैं तो झूमा हूँ, मुझे और झुमाओ यारो..
आज इतनी पिलाओ कि फिर होश न रहे,
अब तो साकी से मुझे और दिलाओ यारो..
रात आधी है बंद है मयकदा,
मेरे जीने के लिए इसको खुलाओ यारो..
पी पी के मरने में वक़्त लगेगा मुझे;
आज ही बंद करके मय न जलाओ यारो.
फिर कभी याद में उसकी न धुआं दिल से उठे ,
इसलिए दिल में लगी आग बुझाओ यारो…
आज फिर जी भर के मुझको पिलाओ यारो..
…atr

उनकी उलझी हुई जुल्फ़ें जब मेरे शानों पे बिखरती है
सुलझ सी जाती है मेरी उलझी हुई जिंदगी

न उस रात चांदनी होती
न वो चांद सा चेहरा दिखता
न मासूम मोहब्बत होती
न नादान दिला ताउम्र तडपता
ये तो मुमकिन नही यूं ही फ़ना हो जाऊं
मैं तो सन्नाटा हूं फैलूं तो सदा हो जाऊं
अब तो उनके घर से सदायें आती हैं ,जो कभी मेरे न थे उनकी भी दुआएं आती हैं …
सुना है उन मकानों में हज़ारो कत्लखाने हैं , जहाँ दिल चूर होते हैं , सलाखें ग़ज़ल गाती हैं…
……
…atr
उनको हर रोज नये चांद सा नया पाया हमने
मगर उन्होने हमें देखा वही पुरानी नजरों से

जब शागिर्द ए शाम तुम हो तो खल्क का ख्याल क्या करें
जुस्तजु ही नहीं किसी जबाब की तो सवाल क्या करें

कैसे करें शिकवे गिले हम उनसे
उनकी हर मासूम खता के हम खिदमतगार है

ये कैसा तसव्वुर, कैसा रब्त, कैसा वक्त है
जो कभी होता भी नहीं, कभी गुजरता भी नहीं
रब्तः संबंध
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