एक बूढ़ी थी लाचार वह,
थी भुख से बेचैन वह ,
बैठी थी सड़क किनारे वह,
लिए हाथों में कटोरा वह,
इस आस में कि पसीजे,
दिल किसी का और
देदे कटोरे में दो चार रु वह,
पर अचंभा तो देखो ,
कि हो ना सका ऐसा ,
लोग आते रहे,
लोग जाते रहे,
पलट कर किसी ने
देखा भी नहीं उसे ,
अजीब विडंबना है ईश्वर तेरी,
कहीं दी इतनी गरीबी तूने
तो कहीं दी जरूरत से ज्यादा अमीरी…….
Ek budhi lachar wah
Comments
6 responses to “Ek budhi lachar wah”
-

Wah
-

Shukriya mitra
-
-

Nice
-

Shukriya sis
-
-

सुन्दर रचना
-

Shukriya mitra
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.