ग़म में भी मुस्कुराते रहे हम आपकी ख़ातिर,
जाम-ए-अश्क1 पीते रहे हम आपकी ख़ातिर।
कोई शाम लाएगी आपका पैग़ाम, ये सोच,
परवाना बन जलते रहे हम आपकी ख़ातिर।
अनजानी थीं राहें, न ख़बर मंज़िल की हमें,
ज़िंदगी भर भटकते रहे हम आपकी ख़ातिर।
सावन के इंतज़ार में सूख गईं हैं आँखें हमारी,
सूखे पत्तों से गिरते रहे हम आपकी ख़ातिर।
चाहते थे हम ज़िंदगी करना बसर2 साथ मगर,
पल-पल तनहा मरते रहे हम आपकी ख़ातिर।
1. आँसुओं का प्याला; 2. बिताना।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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