घुल गया उनका अक्स कुछ इस तरह अक्स में मेरे,
आईना अब ज़रा सा भी न काबिल-ए-ऐतबार रहा।
हमारी मोहब्बत का असर, हुआ उन पर इस क़दर,
निखरी ताबिश-ए-हिना1, न वह रंग-ए-रुख़्सार2 रहा।
दिखाए मौसम ने ऐसे तेवर, हमारी मोहब्बत पर
न वह बहार-ए-बारिश रही, न वह गुलज़ार 3 रहा।
भरी बज़्म4 में हमने अपना दिल नीलाम कर दिया,
क़िस्मत थी हमारी कि वहाँ न कोई ख़रीदार रहा।
तनहाइयों में अब जीने को जी नहीं करता हमारा,
हमें ख़ामोश धड़कनों के ठहरने का इंतज़ार रहा।
1. मेंहदी की चमक; 2. गालों का रंग; 3.फूलों का बगीचा; 4. महफ़िल।
यह ग़ज़ल मेरी पुस्तक ‘इंतज़ार’ से ली गई है। इस किताब की स्याही में दिल के और भी कई राज़, अनकहे ख़यालात दफ़्न हैं। अगर ये शब्द आपसे जुड़ पाए, तो पूरी किताब आपका इंतज़ार कर रही है। – पन्ना
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