Jai hind

सूरज ऊगा था, उस दिन कुछ ऐसा
नया जीवन मिला हो , लगा था कुछ वैसा
आज़ाद पंछी की तरह जब ली थी साँस सबने,
ना होगा स्वर्ग भी इस सुख के जैसा
पर फिर भी तो था कुछ अधूरा उस पल भी,
अम्बेडकर जैसे महान लोगो ने सोचा की
कुछ तो होगा इसका हल भी
तब रच डाला उन्होंने कुछ ऐसा इतिहास
कि देश में इससे ज्यादा ना है अब कुछ ख़ास
आजादी के उस दिन को हम गर्व से बुलाते है स्वतंत्रता दिवस
पर स्वतंत्रता का मतलब ही नही रह जाता
अगर ना मनाता हो कोई धूम धाम से अपना गणतंत्र दिवस ।
– अंकित सिंह डाँगी (अंकु)

Comments

87 responses to “Jai hind”

  1. Daniel Avatar

    Jbbrdst bhai kiya poem h teri
    Too mhan lekhk h bhai
    M bhgban h bhai writers ka

  2. Mannu Avatar

    Badiya meri haan?????

  3. Shivansh Avatar

    वन्दे मातरम्….

  4. Amit Avatar

    Bhai poem bhut acchi h

  5. Umesh Avatar

    Jeet gya mera bhai dangi

  6. Abhishek kumar

    Sundar

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