Akash Singh

  • दिल अपना है मगर धकड़न पराई है,
    इस बात की खबर मैंने ही फैलाई है,

    नज़र वालों ने ही यहाँ नज़र चुराई है,
    इस बात में ढूँढो तो कितनी सच्चाई है,

    किसीने न सुनी मैंने सबसे जो छिपाई है,
    इस बात को दीवार के कान में स […]

  • तराजू के दोनों पलड़ों पर रखकर आंकते देखा,
    वजन प्यार का फिर भी मेरे कम भाँपते देखा,

    बन न पाया था किसी साँचे से जब आकार मेरा,
    के लेकर हाथों में फिर मिट्टी को नरम नापते देखा,

    ढूंढते थक हार […]

  • साथ निभाने के लोगों के तरीके अजीब हैं,
    अपनों से भी ज्यादा लोग गैरों के करीब हैं,

    मर चुके हैं एहसास यूँ दिल की हिफाज़त में,
    के धड़कन में नज़रबंद वो कितने अदीब हैं,

    गुमराह हैं नासमझ इशारे खुदा के ठुकर […]

  • वो दिल ओ दिमाग की पकड़ से बाहिर लगती है,
    सच यह बात उसके चेहरे से ही ज़ाहिर लगती है।।

    राही अंजाना

  • बहुत शोर मच रहा है बाहिर सुनो,
    शायद भीतर मेरे सब ख़ामोश हैं।।
    राही अंजाना

  • जब कभी भी मैं आईने को रूबरू देखता हूँ,
    सूरत और सीरत को खुद की हूबहू देखता हूँ।।

    राही अंजाना

  • वजन ईंटो का उठाकर भी हल्का लगने लगा,
    कन्धों पे जिम्मेदारी का जो हल्ला लगने लगा।।
    राही अंजाना

  • बच्चे की खातर माँ कितने ही दान निकाल देती है, M
    जिस्म से अपनी सौ बार जैसे जान निकाल देती है,

    भूख से बिलखता गर दिख भी जाये कोई मासूम तो,
    कुछ सोचे बिन दुपट्टे से सारा सामान निकाल देती है।।

    राही अंजाना

  • न जाने किस-किस का हसीन आशियाना हूँ मैं,
    लोग कहते हैं के खुले ज़माने का फ़साना हूँ मैं,

    जो उखाड़ने की जद्दोजहद में हैं जड़ों को मेरी,
    उनसे खुले दिल से कहता हूँ के कोई नामा हूँ मैं।।

    राही अंजाना
    नामा […]

  • ख्वाबों ख्यालों में किसी का कोई पहरा नज़र नहीं आता,
    जो नज़र में आता तो उसका कोई चहरा नज़र नहीं आता,

    घूमती गुमराह सी नज़र आती हैं जो खामोश राहें हमको,
    उन राहों पे ढूंढ़े से दूर तलक कोई ठहरा नज़र नहीं आता,

    राही अंजाना

  • तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
    मैं तेरे ख़्यालों की जंज़ीरों का क्या करूँ?
    अश्क़ों को छुपा लेता हूँ पलकों में लेकिन-
    मैं तेरे सपनों की ज़ाग़ीरों का क्या करूँ?

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ?
    मैं तेरे ख़्यालों की जंज़ीरों का क्या करूँ?
    अश्क़ों को छुपा लेता हूँ पलकों में लेकिन-
    मैं तेरे सपनों की ज़ाग़ीरों का क्या करूँ?

    मुक्तककार- #मिथिलेश_राय

  • चेहरे हर एक रोज बदलने का शौख रखते हैं,
    कुछ लोग अपने आप को बड़ा बेख़ौफ़ रखते हैं।।

    राही अंजाना

  • छोटी सी उमर में बदल कर देखो चाल बैठ गया,
    पहनके इंसा ही जानवर की देखो खाल बैठ गया,

    बड़ी बहुत हो गई ख्वाइशों की बोतल उस दिन से,
    रिश्तों का कद भूल जब कोई देखो नाल बैठ गया,

    मनाया मगर माना […]

  • ज्ञान की पोथियाँ सारी चन्द पैसों में तोल लेता हूँ मैं,
    जो भी जब भी मुँह में आ जाये यूँही बोल देता हूँ मैं,

    समझ पाता नहीं हूँ किताबों में लिखे काले अक्षर मैं,
    सो तराज़ू के बाट बराबर ही सबका मोल लेता हूँ मैं […]

  • मन की बातो को कलम के सहारे से इशारा देता हूँ
    मैं अंजाना होकर भी कुछ लहरों को किनारा देता हूँ,

    जब जुबां और दिल सब हार कर अकेले में बैठते हैं,
    तब मैं दर्द से भरी चुनिंदा तस्वीरों का सहारा लेत […]

  • कुछ बेदर्द इंसानों ने अपनी अक्ल उतार कर रख दी,
    मासूम ज़िन्दगी की आईने में शक्ल उतार कर रख दी,

    दिन में लगे जो गहरे घावों की वस्ल उतार कर रख दी,
    पुनर्जन्म के पन्नों की खुदरी नक़्ल उतार कर रख दी।।

    राही अंजाना […]

  • तोड़ सके तो कोशिश कर ले एक और बार,
    अब कसम से दिल को पत्थर कर लिया मैंने।।

    राही अंजाना

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