हिसाब की पंचायत

September 23, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

हिसाब की पंचायत वहाँ लगती हैं
जहाँ दोनो तरफ सौदागर होते हैं

लूटतें हैं दिल की दौलत जब चितचोर
अक्सर ये लूटरोंसे लोग बेखबर होते हैं

बेहिसाब नुक़सान होता है दिलदार का
जब दिल्लगी मे बेईमान ख़ुद दिलबर होतें हैं ।

– Nirmal

बचपन नहीं मरा करता है

June 20, 2016 in हिन्दी-उर्दू कविता

खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर,
केवल जिल्द बदलती पोथी।
जैसे रात उतार चाँदनी,
पहने सुबह धूप की धोती,
वस्त्र बदलकर आने वालों! चाल बदलकर जाने वालों!
चंद खिलौनों के खोने से बचपन नहीं मरा करता है।

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