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    आओ तुमको ले चलूँ वहाँ, जिस जगह वीर इक सोया था ।
    डोली थी सजी हुई लेकिन, वह आत्ममुग्ध सा खोया था ।

    आँखों में चमक अजब सी थी, जैसे पौरुष को जीता हो ।
    था मगर उनींदा ज्यों सपनों, को हाला जैसा पीता हो ।
    होंठों पर मुस्कानें लेटीं, खुद का सौभाग्य जताती थीं ।
    उस वीर पुरुष की दिव्य कथा, सम्मान सहित बतलाती थीं ।
    फलदार वृक्ष सौभाग्य पूर्ण, जीवन में उसने बोया था….
    आओ तुमको………।।

    कहते हैं जय भारत सुनकर, वह दीवाना हो जाता था ।
    सरहद की माटी का चन्दन, माथे पर सदा लगाता था ।
    मदमस्त फिजाओं में केवल, उसकी ही चर्चा होती थी ।
    सूरज की प्रथम किरण उसको, छूकर उदयाचल धोती थी ।
    वह आज विदा होने को था, जन जन का अंतस रोया था….
    आओ तुमको……..।।

    वह बेसुध सी अम्मा उसकी, ललना-ललना कह रोती थी ।
    आँखों से बहती धार प्रबल, उसके पैरों को धोती थी ।
    बेटे के भोले चेहरे को, वह चूम चूम दुलराती थी ।
    छाती को पीट-पीट अम्मा, होकर बेसुध गिर जाती थी ।
    बस वहीं जानती थी उसने, उस रोज वहाँ क्या खोया था…..
    आओ तुमको……।।

    उस ओर बिलखती एक बहन, भाई को गले लगाती थी ।
    कुछ कहती-रोती-चीख लगा, झट से अचेत हो जाती थी ।
    “भैया इस राखी पर किसको, मैं अब राखी भिजवाऊँगी ।
    किसके सीने से लिपट भला, अपने दुख-सुख बतलाऊँगी ।”
    इस तरह बिलखती बहना ने, सारा संसार भिगोया था ….
    आओ तुमको…….।।

    थी चीख उठी कुदरत देखा, करुणा की उन तस्वीरों को ।
    बूढ़ा बापू उस ओर सहज, था तोड़ रहा जंजीरों को ।
    कहता- “किसान का गौरव है, बेटे का यह बलिदान अमर ।
    यों रोकर क्यों करते हो कम, तुम वीरों का सम्मान अमर ।
    ये स्वप्न वहीं साकार हुआ , बेटे ने जिसे सँजोया था….”
    आओ तुमको…..।।

    राहुल द्विवेदी ‘स्मित’