ओ मनमीत मेरे,
मैंने दिल से तुझे पुकारा,
मैं नदिया की धारा,
तुम हो मेरा किनारा,
बिन तेरे जीना मेरा,
होगा नहीं गवारा,
चाहे किस्मत रूठे मुझसे,
या रुठे यह जग सारा,
तुम धूप तो मैं हूं छाया,
तू अंबर तो मैं धरती,
कब तक मिलन होगा हमारा,
अब तक कितने मौसम बीते,
क्या मिलन होगा न ये हमारा,
बीच भंवर में फंसी है मेरी नैया,
तुम आकर कर दो इसे किनारा |
O manmit mere
Comments
12 responses to “O manmit mere”
-

Bahut sundar
-

Thanks
-
-

Bahut sundar kavita
-

Thanks
-
-

वाह
-

Thanks
-
-
Nice
-

Thannks
-
-

Kya baat hai
-

Ok
-

अतिसुन्दर रचना … शब्दों का खूबसूरत प्रयोग
-

वाह
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.