Poems

मेरा प्यार

तुम मेरे पास रहो या रहो मुझसे दूर।
मेरा प्यार कम न होगा करुँगा भरपूर।।

वो खिड़कियाँ

तुम्हारी चादर में लिपटे
कुछ शक के दाग थे।

तुम मेरी मंज़िल और
तुम्ही हमराज थे।

क्या थे दिन और
क्या लम्हात थे।

कुछ अंजाम और
कुछ आगाज़ थे।

इल्जाम लगा किस्मत और हालात पर हम तो, बचपन से ही बर्बाद थे।

सुबह हुई तो देखा
तकिये पर पड़े सूखे,
अश्कों के दाग थे।

वो खिड़कियाँ अब
बन्द ही रहती हैं ,

जिनके दीदार के कभी
हम मोहताज़ थे।

गम है तोह

गम है तोह ज़िन्दा है हम
उम्मीदें कम है तोह किसी तरह खुश है हम

कोई बरी खुशी नहीं चाहिए भगवान
अब तोह इस की आदत सी हो गई

लोग कहते है की वक़्त बदलता है
अपना तोह कब से एक सा ही चल रहा है

ऐ बेदर्द सर्दी! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं

ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।
कहीं मंद शीतल हवाएँ ।
कहीं शबनम की ऱवाएँ ।।
दिन को रात किया कोहरे का कोई जवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा भी कोई हिसाब नहीं।।
कोई चिथड़े में लिपटा ।
कोई घर में है सिमटा ।।
कोई कोट पैंट में भी आके बनता नवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी,,,, ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
रंग बिरंगे कपड़ों में बच्चे ।
आँगन में खेले लगते अच्छे ।।
दादा -दादी के पहरे का कोई हिसाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी ! तुम्हारा,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,।।
रंग -बिरंगी फूलों की क्यारी।
पीले खेत सरसों की न्यारी।।
मटर मूंगफली गाजर के खाने का कोई जवाब नहीं।
ऐ बेदर्द सर्दी…………………………………………………।।
खोज रही है धूप सुहानी ।
जड़-चेतन व सकल प्राणी।।
एक सहारा जिसका सबको ऐसा कोई लिहाफ नहीं।
मन की गर्मी रख “विनयचंद ” ऐसा कोई ताव नहीं।।
ऐ बेदर्द सर्दी!…………………………………………………।।

सर्दी

रज़ाई ओढ़ जब चैन की नींद हम सोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

जिनके न घर-बार, ना ठौर-ठिकाना।
मुश्किल दो वक़्त कि रोटी जुटाना।
दिन तो जैसे – तैसे कट ही जाता है,
रूह काँपती सोच, सर्द रातें बिताना।
गरीबी का अभिशाप ये सर अपने ढोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

भले हम छत का इंतज़ाम न कर सकें।
पर जो कर सकते भलाई से क्यों चूकें।
ठंड से बचने में मदद कर ही सकते हैं,
ताकि इनकी भी ज़िन्दगी सुरक्षित बचे।
कर भला तो, हो भला का बीज बोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

ज़रूरी नहीं, युद्ध हर बार करना पड़े।
आहत होते कई बार जवान बगैर लड़े।
तत्पर वतन की सुरक्षा के लिए हमेशा,
ठण्ड में भी सरहद पर सदा होते खड़े।
खून भी जम जाए पर संयम नहीं खोते हैं।
ठण्ड की मार सहते, ऐसे भी कुछ होते हैं।।

देवेश साखरे ‘देव’

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